आतंकवाद को अपनी सरकारी नीति बनाने वाला पाकिस्तान आज अपने ही घर में घिर चुका है। जिस पाकिस्तानी सेना ने दशकों तक भारत के खिलाफ जिहाद के नाम पर झूठ फैलाया, आज उसी सेना के खिलाफ खैबर पख्तूनख्वा (KPK) के स्वाभिमानी पश्तूनों ने ‘विद्रोह’ का बिगुल फूंक दिया है। पाकिस्तानी सेना के प्रवक्ता (DG ISPR) का हालिया कबूलनामा यह बताता है कि इस्लामाबाद का दमन अब पश्तूनों के हौसलों के आगे पस्त हो चुका है। सेना ने माना है कि खैबर पख्तूनख्वा में विद्रोहियों के लिए माहौल अनुकूल है, जिसका सीधा अर्थ यह है कि वहां की जनता अब पाकिस्तान की ‘आतंकी सरकार’ से छुटकारा पाना चाहती है।
यह लड़ाई आतंकवाद की नहीं, बल्कि आत्मसम्मान और आजादी की है। पाकिस्तान की पंजाबी-वर्चस्व वाली सेना और जनरल आसिम मुनीर पश्तूनों को शक की निगाह से देखते हैं। ख़बरें हैं कि जनरल मुनीर ने अपनी निजी सुरक्षा से सभी पश्तून सैनिकों को हटा दिया है। यह कदम साबित करता है कि जनरल मुनीर जानते हैं कि उनकी फौज ने पश्तूनों पर इतने जुल्म किए हैं कि अब कोई भी पश्तून सिपाही उन पर वफादार नहीं रह सकता। यह पाकिस्तान के भीतर चल रहा एक गहरा जातीय संघर्ष है, जहाँ ‘रावलपिंडी के जनरल’ खैबर के पहाड़ों पर अपना अवैध कब्ज़ा बनाए रखने के लिए संघर्ष कर रहे हैं।
पाकिस्तानी मीडिया और पंजाब प्रांत की जनता ने एक सुनियोजित एजेंडे के तहत पश्तूनों को ‘आतंकवादी’ घोषित करने की कोशिश की है, लेकिन हकीकत इसके उलट है। खैबर पख्तूनख्वा के ये ‘विद्रोही’ असल में वे लोग हैं जो पाकिस्तान द्वारा पोषित आतंकवाद से तंग आ चुके हैं। वे अपनी जमीन पर पाकिस्तान आर्मी की छावनियां और उनके द्वारा पाले गए आतंकी संगठन नहीं चाहते। जब ये लोग अपने अधिकारों और सुरक्षा की मांग करते हैं, तो पाकिस्तान की कायर फौज उन पर गोलियां बरसाती है, जिससे विद्रोह की आग और भड़क रही है।

भारत हमेशा से कहता आया है कि पाकिस्तान अपने ही नागरिकों, चाहे वो बलोच हों या पश्तून, का दमन करता है। आज खैबर पख्तूनख्वा का हाथ से निकलना यह साबित करता है कि पाकिस्तान नाम का यह कृत्रिम देश अब अपनी अंतिम सांसे गिन रहा है। जो विद्रोही आज पाकिस्तानी चौकियों को उखाड़ फेंक रहे हैं, वे दुनिया को संदेश दे रहे हैं कि वे उस सरकार का हिस्सा नहीं रहना चाहते जो पूरी दुनिया में आतंकवाद की फैक्ट्री के नाम से जानी जाती है। यह पाकिस्तान के टूटने की शुरुआत है, और इस बार यह दरार इतनी चौड़ी है जिसे जनरल मुनीर की बंदूकें नहीं भर सकतीं।
अपनी राय दें: क्या पाकिस्तान के टुकड़े होना तय है?
जिस तरह 1971 में पाकिस्तान की सेना के जुल्मों ने बांग्लादेश को जन्म दिया था, क्या आज वही इतिहास खैबर पख्तूनख्वा में दोहराया जा रहा है?
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- क्या पश्तून विद्रोहियों को पाकिस्तान की ‘आतंकी सरकार’ से अलग होकर अपना खुद का देश बना लेना चाहिए?
- क्या भारत को इन पश्तून स्वतंत्रता सेनानियों का नैतिक समर्थन करना चाहिए?
हम आपकी राय का इंतज़ार कर रहे हैं।
