भारत के चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (CDS) जनरल अनिल चौहान का हालिया आर्मेनिया दौरा वैश्विक रक्षा समीकरणों के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। यह दौरा न केवल दोनों देशों के बीच बढ़ते सैन्य सहयोग का प्रतीक है, बल्कि रणनीतिक रूप से तुर्की और पाकिस्तान जैसे देशों के गठजोड़ को भारत का एक कड़ा जवाब भी माना जा रहा है। रक्षा गलियारों में चर्चा है कि यह यात्रा भविष्य में बड़े रक्षा समझौतों की नींव रख सकती है।
डिफेंस एक्सपोर्ट का नया केंद्र बना आर्मेनिया
भारत के लिए आर्मेनिया (India-Armenia Military Ties) अब केवल एक मित्र देश नहीं, बल्कि रक्षा निर्यात (Defense Export) का एक प्रमुख गंतव्य बन चुका है। पिछले कुछ वर्षों में आर्मेनिया ने भारत से ‘पिनाका’ मल्टी-बैरल रॉकेट लॉन्चर, एंटी-टैंक मिसाइलें और ‘स्वाति’ वेपन लोकेटिंग रडार जैसे महत्वपूर्ण हथियार खरीदे हैं। जनरल चौहान की इस यात्रा का मुख्य उद्देश्य इन हथियारों के प्रदर्शन की समीक्षा करना और आर्मेनियाई सेना की भविष्य की जरूरतों को समझना है, जिससे भारत की ‘मेक इन इंडिया’ पहल को वैश्विक स्तर पर मजबूती मिले।

रणनीतिक घेराबंदी और भू-राजनीतिक मायने
आर्मेनिया और अजरबैजान के बीच चल रहे संघर्ष में तुर्की और पाकिस्तान खुलकर अजरबैजान का साथ देते रहे हैं। ऐसे में भारत का आर्मेनिया को सैन्य रूप से मजबूत करना इस क्षेत्र में शक्ति संतुलन (Balance of Power) बनाए रखने की एक बड़ी कोशिश है। जनरल अनिल चौहान की यह यात्रा संदेश देती है कि भारत अब अपने रणनीतिक हितों की रक्षा के लिए अपनी सीमाओं से दूर भी सक्रिय भूमिका निभाने को तैयार है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह दौरा भारत की ‘एक्सटेंडेड नेबरहुड’ पॉलिसी का हिस्सा है।

अतीत का संघर्ष और भविष्य की रक्षा तैयारी
अगर इतिहास पर नजर डालें, तो आर्मेनिया ने लंबे समय तक सोवियत काल के रूसी हथियारों पर भरोसा किया था, लेकिन हालिया युद्धों में इन हथियारों की सीमाओं ने उन्हें नए विकल्पों की तलाश करने पर मजबूर किया। यहीं भारत की भूमिका अहम हो गई। पुराने रूसी हथियारों की तुलना में भारतीय हथियार न केवल आधुनिक हैं, बल्कि पश्चिमी तकनीक और रूसी प्लेटफॉर्म के साथ आसानी से तालमेल (Integration) बिठाने में सक्षम हैं। भविष्य में भारत आर्मेनिया को मध्यम दूरी की सतह से हवा में मार करने वाली मिसाइल (MRSAM) और आकाश मिसाइल सिस्टम जैसे और भी घातक हथियार दे सकता है।
रक्षा विशेषज्ञों की नजर में दौरा
रक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि किसी भी देश का सीडीएस स्तर का अधिकारी तभी दौरा करता है जब सैन्य सहयोग केवल खरीद-फरोख्त से बढ़कर रणनीतिक साझेदारी में बदल रहा हो। अधिकारियों के अनुसार, इस दौरे के दौरान दोनों देशों के बीच संयुक्त सैन्य अभ्यास और आर्मेनियाई सैनिकों को भारतीय सैन्य अकादमियों में प्रशिक्षण देने जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर भी चर्चा हुई है। यह सहयोग भविष्य में मध्य एशिया में भारत की पकड़ को और मजबूत करेगा।
