भारतीय सैन्य इतिहास के पन्नों पर अंकित शौर्यगाथाएं स्याही से नहीं, बल्कि वीरों के रक्त और अदम्य साहस से लिखी गई हैं। स्वतंत्रता के उषाकाल और विभाजन की विभीषिका के ठीक बाद, 1947 में जब शत्रु ने भारत के मस्तक कश्मीर को छल से छीनने का दुस्साहस किया, तो यह मात्र एक सीमा संघर्ष नहीं, बल्कि राष्ट्र के अस्तित्व की अग्निपरीक्षा बन गया।
इसी महासमर में 3 नवंबर 1947 को ‘बड़गाम की रणभूमि’ उस ऐतिहासिक पराक्रम की साक्षी बनी, जहां मेजर सोमनाथ शर्मा (Major Somnath Sharma) और उनके जांबाज साथियों ने बारूद की आंधियों के बीच ‘आखिरी गोली और आखिरी सिपाही’ तक लड़ते हुए फौलादी दीवार खड़ी कर दी। उनके इस सर्वोच्च बलिदान ने न केवल श्रीनगर को पतन से बचाया, बल्कि दक्षिण एशिया के मानचित्र पर भारत की संप्रभुता की अमिट लकीर खींच दी।
इस अभूतपूर्व सामरिक रक्षा और अदम्य साहस का नेतृत्व भारतीय थल सेना की गौरवशाली चौथी कुमाऊं रेजीमेंट (4 Kumaon) की ‘डी’ कंपनी (जिसे कुछ ऐतिहासिक सैन्य अभिलेखों में ‘ए’ कंपनी के रूप में भी संदर्भित किया गया है) के कमांडर मेजर सोमनाथ शर्मा ने किया था । यह विस्तृत शोध रिपोर्ट मेजर सोमनाथ शर्मा के असाधारण सैन्य नेतृत्व, उनके प्रारंभिक जीवन और पारिवारिक सैन्य विरासत, बड़गाम के युद्ध के सूक्ष्म सामरिक आयामों, युद्ध के मैदान में एक टूटे हुए और प्लास्टर लगे हाथ के साथ उनके द्वारा किए गए गोला-बारूद के निर्बाध वितरण, और उस प्रति-तथ्यात्मक (Counterfactual) भू-राजनीतिक परिदृश्य का गहन और विश्लेषणात्मक अध्ययन प्रस्तुत करती है जो श्रीनगर हवाई अड्डे के पतन की स्थिति में उत्पन्न हो सकता था। मेजर शर्मा को उनके अदम्य साहस, निस्वार्थ सेवा और सर्वोच्च बलिदान के लिए मरणोपरांत स्वतंत्र भारत के सर्वोच्च सैन्य अलंकरण, ‘परमवीर चक्र’ (Param Vir Chakra) से सम्मानित किया गया, जिससे वह इस प्रतिष्ठित पदक के इतिहास में प्रथम प्राप्तकर्ता बने।
साजिश: ‘ऑपरेशन गुलमर्ग’ और कश्मीर हड़पने का ‘नापाक’ प्लान
अगस्त 1947 में ब्रिटिश भारत के विभाजन के बाद, भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम के तहत उपमहाद्वीप को भारत और पाकिस्तान नामक दो संप्रभु राष्ट्रों में विभाजित कर दिया गया । इस विभाजन के साथ ही ब्रिटिश क्राउन के अधीन 500 से अधिक रियासतों को यह स्वायत्त विकल्प दिया गया था कि वे अपनी भौगोलिक स्थिति और जनसांख्यिकी को ध्यान में रखते हुए या तो भारत में शामिल हों, पाकिस्तान में शामिल हों, या फिर एक स्वतंत्र इकाई के रूप में अपना अस्तित्व बनाए रखें । जम्मू और कश्मीर के तत्कालीन डोगरा शासक, महाराजा हरि सिंह, एक स्वतंत्र राज्य की आकांक्षा रखते हुए किसी भी अधिराज्य में शामिल होने से हिचकिचा रहे थे और उन्होंने दोनों देशों के साथ ‘स्टैंडस्टिल एग्रीमेंट’ (Standstill Agreement) पर विचार किया ।
दूसरी ओर, नवगठित राष्ट्र पाकिस्तान ने अपनी भौगोलिक निकटता और कश्मीर की मुस्लिम बहुल आबादी के आधार पर इस रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण क्षेत्र पर अपना स्वाभाविक दावा ठोंक दिया था । जब पाकिस्तानी नेतृत्व को यह स्पष्ट प्रतीत होने लगा कि महाराजा हरि सिंह स्वेच्छा से या राजनीतिक कूटनीति के माध्यम से पाकिस्तान में शामिल नहीं होंगे, तो पाकिस्तानी सैन्य और राजनीतिक प्रतिष्ठान ने बलपूर्वक कश्मीर पर कब्जा करने के लिए एक अत्यंत गुप्त और आक्रामक रणनीति तैयार की, जिसे सैन्य इतिहास में ‘ऑपरेशन गुलमर्ग’ (Operation Gulmarg) के नाम से जाना जाता है ।

आक्रमण: 20 हजार कबायली और बारूद का खूनी खेल
भारतीय सैन्य स्रोतों और ऐतिहासिक दस्तावेजों के अनुसार, पाकिस्तानी सेना ने 20 अगस्त 1947 के आसपास ही इस ऑपरेशन की रूपरेखा तैयार कर ली थी । इस आक्रामक योजना के तहत उत्तर-पश्चिमी सीमांत प्रांत (NWFP – वर्तमान खैबर पख्तूनख्वा) और फाटा (FATA) क्षेत्रों से लगभग 20 ‘लश्कर’ (Tribal militias) की भर्ती की गई । प्रत्येक लश्कर में लगभग 1,000 पश्तून कबायली और अनियमित लड़ाके शामिल थे, जिन्हें बन्नू, वाना, पेशावर, कोहाट, थल और नौशेरा जैसे पाकिस्तानी सैन्य मुख्यालयों पर हथियार और रसद उपलब्ध कराई गई थी ।
पाकिस्तानी सेना के नियमित अधिकारियों, जैसे अकबर खान, के छद्म सामरिक निर्देशन और साजो-सामान के समर्थन के साथ, इन कबायली घुसपैठियों ने 22 अक्टूबर 1947 को कश्मीर पर बड़े पैमाने पर आक्रमण कर दिया । इन हमलावरों का प्राथमिक उद्देश्य बिना किसी पूर्व चेतावनी के कश्मीर घाटी में प्रवेश करना, मुजफ्फराबाद और उरी को पार करते हुए श्रीनगर पर कब्ज़ा करना और महाराजा के पास भारत से सैन्य सहायता मांगने का अवसर बचने से पहले ही राज्य को अपने अधीन कर लेना था ।
| विवरण और भूमिका | अनुमानित संख्या |
| पश्तून कबायली लश्कर उत्तर-पश्चिमी सीमांत प्रांत के अनियमित लड़ाके, जिनका मुख्य उद्देश्य आतंक फैलाना और तीव्र गति से आगे बढ़ना था। | 10,000 – 20,000 |
| पाकिस्तानी सेना (अनियमित/छद्म) लश्करों को रसद, हथियार, मोर्टार और सामरिक नेतृत्व प्रदान करना। | अज्ञात, लेकिन निर्णायक भूमिका |
| स्थानीय विद्रोही (मुस्लिम लीग गार्ड आदि) पुंछ, भिंबर और रावलकोट क्षेत्रों में समर्थन। | 10,000 के आसपास |
मुजफ्फराबाद में तैनात महाराजा की सेना (4थी जम्मू और कश्मीर लाइट इन्फैंट्री) इस अचानक हुए हमले का सामना नहीं कर सकी। इस इकाई में आधे डोगरा हिंदू और आधे पुंछ के मुस्लिम सैनिक थे, जिनमें से कुछ विद्रोह कर पाकिस्तानी लश्कर के साथ मिल गए, जिससे कश्मीर के प्रवेश द्वार पूरी तरह से खुल गए । इसके बाद हमलावर तेजी से आगे बढ़े और 25-27 अक्टूबर के बीच उन्होंने बारामूला पर कब्ज़ा कर लिया । बारामूला में घुसपैठियों ने भयंकर लूटपाट, आगजनी और नागरिकों (विशेषकर मिशनरी अस्पताल में) के खिलाफ जघन्य अपराध किए । हालांकि इस क्रूरता ने मानवीय दृष्टिकोण से एक त्रासदी को जन्म दिया, लेकिन रणनीतिक दृष्टिकोण से इसी लूटपाट ने हमलावरों की श्रीनगर की ओर बढ़ने की गति को धीमा कर दिया, जिससे भारत को प्रतिक्रिया देने का एक अत्यंत संक्षिप्त लेकिन महत्वपूर्ण अवसर मिल गया ।

ऐतिहासिक एयरलिफ्ट: जब श्रीनगर बचाने आसमान से उतरी भारतीय सेना
आक्रमण की तीव्रता और कश्मीर घाटी के आसन्न पतन को देखते हुए, महाराजा हरि सिंह 26 अक्टूबर 1947 को जम्मू पहुंचे। निराशा और भय के बीच, उन्होंने भारत सरकार से तत्काल सैन्य हस्तक्षेप और सहायता का अनुरोध किया । नई दिल्ली में रक्षा समिति की आपातकालीन बैठक में यह निर्णय लिया गया कि भारत केवल तभी अपनी सेना भेज सकता है जब कश्मीर कानूनी रूप से भारतीय संघ का हिस्सा बन जाए । परिणामस्वरूप, 26 अक्टूबर 1947 को महाराजा हरि सिंह ने भारत के साथ ‘इंस्ट्रूमेंट ऑफ एक्सेशन’ (Instrument of Accession) पर हस्ताक्षर कर दिए, जिससे जम्मू और कश्मीर विधिक रूप से भारत का अभिन्न अंग बन गया ।
विलय पत्र पर हस्ताक्षर होते ही, 27 अक्टूबर 1947 की सुबह स्वतंत्र भारत के इतिहास का पहला, सबसे जटिल और सबसे दुस्साहसिक सैन्य एयरलिफ्ट अभियान शुरू हुआ । भारतीय वायु सेना (IAF) के डकोटा डीसी-3 (Dakota DC-3) परिवहन विमानों ने दिल्ली के सफदरजंग और पालम हवाई अड्डों से सिख रेजीमेंट की पहली बटालियन (1 Sikh) के सैनिकों को लेकर श्रीनगर के लिए उड़ान भरी । इस अभियान का नेतृत्व लेफ्टिनेंट कर्नल दीवान रंजीत राय कर रहे थे ।
कच्ची हवाई पट्टी और नागरिकों का जोश: नामुमकिन को बनाया मुमकिन
श्रीनगर हवाई अड्डे पर विमान उतारना कोई सामान्य सैन्य संचालन नहीं था। उस समय यह हवाई अड्डा केवल एक धूल भरी, कच्ची हवाई पट्टी थी जिसमें कोई भी आधुनिक लैंडिंग उपकरण (Landing aids), रडार या एयर ट्रैफिक कंट्रोल (ATC) की उचित व्यवस्था नहीं थी । सर्दियों की शुरुआत के कारण हवाई पट्टी पर बर्फ भी जमा होने लगी थी ।
इस अत्यंत नाज़ुक समय में स्थानीय नागरिकों और स्वयंसेवकों की भूमिका को ऐतिहासिक अभिलेखों में महत्वपूर्ण माना गया है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के लगभग 600 स्वयंसेवकों ने रातों-रात हवाई पट्टी से बर्फ हटाने और उसे विमानों के उतरने लायक बनाने का अथक कार्य किया । 27 अक्टूबर की सुबह लगभग 09:30 बजे पहली उड़ान सफलतापूर्वक उतरी, और भारतीय सैनिकों ने तुरंत हवाई अड्डे की परिधि को सुरक्षित कर लिया । लेफ्टिनेंट कर्नल रंजीत राय ने तुरंत बारामूला की ओर कूच किया, लेकिन घुसपैठियों की भारी संख्या का सामना करते हुए वह वीरगति को प्राप्त हुए (उन्हें मरणोपरांत महा वीर चक्र प्रदान किया गया) । उनके इस त्वरित कदम ने हमलावरों को कुछ समय के लिए पट्टन (Pattan) के पास रोक दिया, जिससे श्रीनगर हवाई अड्डे पर अतिरिक्त भारतीय सैनिकों के उतरने के लिए बहुमूल्य समय मिल गया ।

विरासत: रगों में दौड़ता फौजी खून और परमवीर संस्कार
श्रीनगर हवाई अड्डे की रक्षा का अंतिम और सबसे महत्वपूर्ण अध्याय 4 कुमाऊं रेजीमेंट और उसके वीर कमांडर मेजर सोमनाथ शर्मा के इर्द-गिर्द बुना गया था। सोमनाथ शर्मा का जन्म 31 जनवरी 1923 को पंजाब प्रांत (अब हिमाचल प्रदेश) के कांगड़ा जिले के दाढ़ (Dadh) नामक गाँव में एक अत्यंत प्रतिष्ठित और कुलीन सैन्य परिवार में हुआ था । उनके परिवार की रगों में सैन्य सेवा, अनुशासन और राष्ट्रप्रेम की गहरी और समृद्ध परंपरा रची-बसी थी, जिसने उनके व्यक्तित्व और नेतृत्व क्षमता को आकार देने में आधारभूत भूमिका निभाई ।
पारिवारिक सैन्य पृष्ठभूमि
मेजर शर्मा का परिवार भारतीय सैन्य इतिहास के सबसे उल्लेखनीय परिवारों में से एक है:
- पिता: उनके पिता, मेजर जनरल अमरनाथ शर्मा, भारतीय सेना की चिकित्सा कोर (Army Medical Corps) में एक अत्यंत सम्मानित और वरिष्ठ अधिकारी थे, जो बाद में सशस्त्र चिकित्सा सेवाओं के महानिदेशक (Director General of the Armed Medical Services) के रूप में सेवानिवृत्त हुए।
- भाई: सैन्य नेतृत्व का यह विशिष्ट गुण उनके भाइयों में भी पूर्ण रूप से परिलक्षित हुआ। उनके छोटे भाई जनरल विश्व नाथ शर्मा (V. N. Sharma) ने 1988 से 1990 तक भारतीय थल सेना के सेनाध्यक्ष (Chief of the Army Staff) के सर्वोच्च पद को सुशोभित किया । एक अन्य भाई, लेफ्टिनेंट जनरल सुरिंदर नाथ शर्मा ने भी इंजीनियर-इन-चीफ के रूप में सेना में विशिष्ट और दीर्घकालिक सेवा प्रदान की ।
- बहन: उनकी बहन, मेजर कमला तिवारी ने भी पारिवारिक परंपरा का निर्वहन करते हुए आर्मी मेडिकल कोर में एक सैन्य चिकित्सक के रूप में अपनी सेवाएं दीं।
- मामा: उनके मामा, कैप्टन कृष्ण दत्त वासुदेव, 19वीं हैदराबाद रेजीमेंट की चौथी बटालियन (जिसमें बाद में सोमनाथ शामिल हुए) में सेवारत थे। उन्होंने द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान मलय अभियान में अपने प्राणों की आहुति देकर सैकड़ों सैनिकों की जान बचाई थी । मामा के इस निस्वार्थ आत्मबलिदान ने युवा सोमनाथ के मस्तिष्क पर अमिट छाप छोड़ी और उनके भीतर सर्वोच्च बलिदान के बीज बो दिए ।

प्रारंभिक शिक्षा और सैन्य प्रशिक्षण
मेजर शर्मा की प्रारंभिक शिक्षा नैनीताल के प्रसिद्ध शेरवुड कॉलेज (Sherwood College) में हुई, जहाँ उन्होंने अपने छोटे भाई ‘टिंडी’ (V. N. Sharma) के साथ पढ़ाई की । बचपन में उन्हें प्यार से ‘सोमी’ (Somi) के नाम से पुकारा जाता था। स्कूल के दिनों में वे एक रक्षक की भूमिका में रहते थे और अपने भाई को वरिष्ठ छात्रों की बदमाशी (Bullying) से बचाते थे । उनका मन किताबी पढ़ाई से अधिक इतिहास के पन्नों, सैन्य रणनीतियों और सामान्य ज्ञान में लगता था ।
सैन्य जीवन के प्रति उनके अटूट आकर्षण के कारण, मात्र दस वर्ष की अल्पायु में ही उन्होंने देहरादून स्थित प्रतिष्ठित प्रिंस ऑफ वेल्स रॉयल मिलिट्री कॉलेज (अब राष्ट्रीय भारतीय सैन्य कॉलेज – RIMC) में प्रवेश प्राप्त किया । वहाँ से उत्तीर्ण होने के बाद 1941 में उन्होंने भारतीय सैन्य अकादमी (IMA) और बाद में रॉयल मिलिट्री अकादमी (Royal Military Academy) से अपना औपचारिक सैन्य प्रशिक्षण अत्यंत कठोरता और अनुशासन के साथ पूरा किया ।
22 फरवरी 1942 को, मात्र 19 वर्ष की आयु में, उन्हें ब्रिटिश भारतीय सेना की 19वीं हैदराबाद रेजीमेंट की 8वीं बटालियन में कमीशन प्राप्त हुआ (इस रेजीमेंट को बाद में भारतीय सेना की कुमाऊं रेजीमेंट की चौथी बटालियन, अर्थात 4 Kumaon के रूप में पुनर्गठित किया गया) । युवा सोमनाथ के लिए उसी रेजीमेंट में शामिल होना एक अत्यंत भावुक क्षण था, जिसमें उनके वीर मामा ने सेवा की थी।
मिसाल: ‘घायल साथी को पीछे नहीं छोडूंगा’ – अराकान युद्ध का वो किस्सा
एक सैन्य अधिकारी के रूप में मेजर सोमनाथ शर्मा की सामरिक बुद्धिमत्ता, युद्धक्षेत्र में उनके अदम्य साहस और उनके नैतिक चरित्र की पहली वास्तविक परीक्षा द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान बर्मा (वर्तमान म्यांमार) के घने जंगलों में लड़े गए अत्यंत कठिन और रक्तरंजित ‘अराकान अभियान’ (Arakan Campaign) में हुई । इस अभियान में उन्होंने तत्कालीन कर्नल (और बाद में भारतीय सेना के अत्यंत लोकप्रिय सेनाध्यक्ष) के.एस. थिमैया (K.S. Thimayya) के नेतृत्व में जापानी शाही सेना के खिलाफ भीषण और क्रूर युद्ध लड़ा था ।
अराकान के दुर्गम परिदृश्य में लड़ी गई एक भीषण मुठभेड़ के दौरान, उनकी सैन्य इकाई भारी जापानी गोलीबारी की चपेट में आ गई थी। इस अराजकता के बीच, शर्मा का एक अर्दली (Orderly) सैनिक, जिसका नाम ‘बहादुर’ था, जापानी गोलाबारी में गंभीर रूप से घायल हो गया । वह सैनिक अत्यधिक रक्तस्राव के कारण चलने-फिरने में पूरी तरह से असमर्थ था और सुरक्षित सैन्य शिविर तक उसका लौटना लगभग असंभव प्रतीत हो रहा था।
जब कर्नल थिमैया ने देखा कि उनका एक युवा और होनहार अधिकारी एक घायल सैनिक के भारी वजन के नीचे संघर्ष कर रहा है, तो उन्होंने सामरिक वापसी की तात्कालिकता और जापानी सेना के तेज़ होते हमले को देखते हुए शर्मा को स्पष्ट आदेश दिया कि वे घायल व्यक्ति को वहीं पीछे छोड़ दें और अपनी जान बचाकर तुरंत शिविर की ओर भागें । एक सैन्य अधिकारी के लिए अपने वरिष्ठ का आदेश मानना सर्वोपरि होता है, लेकिन सोमनाथ शर्मा के लिए अपने सैनिक का जीवन उससे भी बड़ा था।
इस निर्णायक बिंदु पर सोमनाथ शर्मा का वह अद्भुत चारित्रिक गुण प्रकट हुआ जो आगे चलकर कश्मीर के युद्ध में उन्हें एक अमर किंवदंती बनाने वाला था। उन्होंने अपने कमांडिंग ऑफिसर की आँखों में देखते हुए दृढ़ता से उत्तर दिया, “श्रीमान, यह मेरा अपना अर्दली है जिसे मैं ले जा रहा हूँ; वह बुरी तरह घायल है और उसका खून बह रहा है, मैं उसे पीछे नहीं छोड़ूंगा” (Sir, it is my own orderly that I am carrying; he is badly wounded and bleeding, I will not leave him behind) । भारी दुश्मन की गोलीबारी के बीच, अपनी जान की रत्ती भर भी परवाह न करते हुए, उन्होंने उस घायल सैनिक को अपने कंधों पर उठाकर लंबी दूरी तय की और उसे सुरक्षित स्थान तक पहुँचाकर उसकी जान बचाई ।
इस असाधारण बहादुरी, करुणा और अनुकरणीय नेतृत्व के लिए उन्हें आधिकारिक रूप से ‘मेंशंड इन डिस्पैचेस’ (Mentioned in dispatches) सम्मान से अलंकृत किया गया । इस घटना ने यह निर्विवाद रूप से सिद्ध कर दिया कि शर्मा ‘नेतृत्व के उदाहरण’ (Leadership by Example) में विश्वास रखने वाले अधिकारी थे। वे एक ऐसे कमांडर थे जो अपने जवानों को कभी ऐसे खतरे या मोर्चे पर नहीं भेजते थे जिसका सामना करने का साहस वे स्वयं न रखते हों । यह वही नेतृत्व शैली और चारित्रिक बल था जो 1947 के कश्मीर युद्ध में उनकी कंपनी के अद्वितीय मनोबल और 1 के मुकाबले 7 के अनुपात में भी डटे रहने का मुख्य कारण बना।
जुनून: हाथ में प्लास्टर, फिर भी जंग के मैदान में जाने की जिद
स्वतंत्रता प्राप्ति के तुरंत बाद, देश भर में विभाजन के कारण भड़के सांप्रदायिक दंगों के दौरान मेजर शर्मा ने पंजाब में आंतरिक सुरक्षा और कानून-व्यवस्था बनाए रखने में पुलिस और प्रशासन की उल्लेखनीय सहायता की थी । इसी दौरान, उनके नाना का श्रीनगर में निधन हो गया, जो सांप्रदायिक हिंसा से अत्यधिक व्यथित थे । इसी समय, मुजफ्फराबाद में उनके मामा को एक स्थानीय मुस्लिम मित्र ने कश्मीर पर होने वाले संभावित हमले की चेतावनी दी थी ।
जब 22 अक्टूबर 1947 को कश्मीर पर वास्तविक हमला शुरू हुआ, तब सोमनाथ शर्मा 4 कुमाऊं की डेल्टा (D) कंपनी के मेजर के रूप में कार्यरत थे । 31 अक्टूबर 1947 को, जब श्रीनगर हवाई अड्डे पर भारतीय सेना का कुमुक पहुंचना जारी था, मेजर शर्मा की कंपनी को भी दिल्ली के पालम हवाई अड्डे से श्रीनगर के लिए एयरलिफ्ट किया गया ।
यहाँ मेजर शर्मा की शारीरिक स्थिति का उल्लेख करना अत्यंत महत्वपूर्ण है, जो उनके समर्पण की गाथा को और भी प्रेरणादायक बनाता है। कश्मीर जाने से कुछ समय पूर्व, एक हॉकी मैच खेलते समय उनके बाएं हाथ की हड्डी टूट गई थी । चिकित्सा प्रोटोकॉल और सैन्य नियमों के अनुसार, प्लास्टर बंधे हाथ वाले किसी भी अधिकारी को सक्रिय युद्ध क्षेत्र (Active combat zone) में तैनात नहीं किया जाता है और उन्हें आराम करने की सलाह दी जाती है। लेकिन जब शर्मा को पता चला कि उनकी बटालियन को कश्मीर के मोर्चे पर भेजा जा रहा है, तो उन्होंने पीछे रुकने से साफ इनकार कर दिया। उन्होंने अपने कमांडिंग अधिकारियों और ब्रिगेड मुख्यालय से विशेष अनुमति मांगी और इस बात पर ज़ोर दिया कि उनकी कंपनी को युद्ध के मैदान में उनके नेतृत्व की आवश्यकता है । एक टूटे हुए हाथ के साथ युद्ध के मैदान में जाने का उनका यह हठ उनके निडर व्यक्तित्व और अपनी मातृभूमि के प्रति उनके असीम प्रेम का प्रतीक था।
रणनीति: हवाई अड्डा बचाना मतलब कश्मीर बचाना
1947 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के प्रारंभिक और सबसे नाजुक चरण को समझने के लिए श्रीनगर हवाई अड्डे (Srinagar Airport/Airfield) के भू-सामरिक महत्व का सटीक और विस्तृत विश्लेषण करना अत्यंत आवश्यक है। सैन्य रणनीति के दृष्टिकोण से, यह हवाई अड्डा संपूर्ण कश्मीर घाटी का गुरुत्वाकर्षण केंद्र (Center of Gravity) बन चुका था ।
उस समय भारत से कश्मीर घाटी तक सैनिकों, रसद और साजो-सामान को सुचारू रूप से पहुँचाने के लिए कोई भी सुरक्षित, बारहमासी और सीधा सड़क मार्ग उपलब्ध नहीं था । पंजाब से जम्मू होते हुए पीर पंजाल श्रृंखला को पार कर श्रीनगर तक पहुँचने वाला मार्ग सर्दियों की बर्फबारी के कारण लगभग दुर्गम हो चुका था। भौगोलिक संरचनाओं और परिवहन अवसंरचना के अभाव के कारण, हवाई मार्ग ही एकमात्र ऐसा साधन था जिससे भारतीय सेना की कुमुक समय रहते श्रीनगर पहुँच सकती थी ।
पाकिस्तानी सैन्य योजनाकार इस सामरिक वास्तविकता को भली-भांति समझते थे। यदि पाकिस्तानी कबायली लश्कर इस हवाई अड्डे पर कब्जा कर लेते, तो इसके निम्नलिखित भयावह सामरिक परिणाम होते :
- सैनिकों की आवाजाही पर पूर्ण प्रतिबंध: हवाई अड्डे के पतन का अर्थ था कि भारतीय सेना का कोई भी नया कुमुक (Reinforcement), हथियार या रसद घाटी में प्रवेश नहीं कर पाता। हवाई पुल (Air bridge) कटते ही घाटी में मौजूद मुट्ठी भर भारतीय सैनिक पूरी तरह से अलग-थलग पड़ जाते।
- श्रीनगर शहर तक निर्बाध पहुँच: हवाई अड्डे या उसके निकटवर्ती बड़गाम क्षेत्र (जो हवाई अड्डे से मात्र कुछ किलोमीटर दूर एक ऊंचाई वाला क्षेत्र था) पर कब्ज़ा करने से हमलावरों को श्रीनगर शहर तक पहुँचने का सीधा और खुला मार्ग मिल जाता । इससे पट्टन (Pattan) में स्थापित भारतीय सुरक्षा घेरा पूरी तरह से अप्रासंगिक और दरकिनार (Bypass) हो जाता।
- मनोवैज्ञानिक और राजनीतिक पतन: कश्मीर की ग्रीष्मकालीन राजधानी श्रीनगर के पतन का अर्थ था राज्य का मनोवैज्ञानिक, जनसांख्यिकीय और राजनीतिक रूप से पाकिस्तान के हाथों में चला जाना। यह भारत के लिए एक अपूरणीय कूटनीतिक और सैन्य हार होती ।
यही कारण था कि भारतीय सेना के नेतृत्व, विशेष रूप से 161 इन्फैंट्री ब्रिगेड के तत्कालीन कमांडर ब्रिगेडियर एल.पी. सेन (L.P. Sen), ने यह स्पष्ट निर्देश दिया था कि किसी भी परिस्थिति में श्रीनगर हवाई अड्डे को दुश्मन के हाथों में नहीं पड़ने देना है ।
महासमर: 700 दुश्मनों के सामने अड़े 90 जांबाज
बड़गाम का युद्ध केवल बंदूकों, गोलियों और मोर्टारों का एक सामान्य सैन्य संघर्ष नहीं था; यह एक छोटे, सीमित सैन्य दल के असीमित धैर्य, सामरिक सूझबूझ और एक विशाल, क्रूर शत्रु सेना की आक्रामक शक्ति के बीच का ऐतिहासिक टकराव था । बड़गाम (Badgam/Budgam) गाँव श्रीनगर हवाई अड्डे से बमुश्किल 5 किलोमीटर (लगभग कुछ मील) की दूरी पर स्थित था । इसकी भौगोलिक स्थिति ऐसी थी कि यह एक सामरिक ऊँचाई पर स्थित था, जहाँ से संपूर्ण हवाई अड्डे की गतिविधियों की स्पष्ट निगरानी की जा सकती थी और वहां से सीधे हमले किए जा सकते थे ।
गश्त का आदेश और प्रारंभिक तैनाती
हमलावरों के एक बड़े समूह की घाटी में घुसपैठ की खुफिया सूचनाओं के आधार पर, ब्रिगेडियर एल.पी. सेन ने उत्तर और पश्चिम की ओर से श्रीनगर की तरफ बढ़ रहे घुसपैठियों को रोकने और उनकी स्थिति का पता लगाने के लिए बड़गाम के निकट पहाड़ियों पर एक मजबूत गश्ती दल (Fighting patrol) भेजने का आदेश दिया ।
इस गश्ती दल में 4 कुमाऊं की दो कंपनियां (मेजर शर्मा के नेतृत्व में) और 1 पैरा कुमाऊं की एक कंपनी (कैप्टन रोनाल्ड वुड के नेतृत्व में) शामिल थी । 3 नवंबर 1947 की सुबह, पहली किरण के साथ ही मेजर सोमनाथ शर्मा ने अपनी ‘डी’ कंपनी को बड़गाम गाँव के दक्षिण में एक अत्यंत महत्वपूर्ण सामरिक मोर्चे पर तैनात कर दिया । सुबह 11:00 बजे तक उन्होंने अपनी स्थिति पूरी तरह से सुदृढ़ कर ली थी ।
योजना और आदेश के अनुसार, गश्ती दल को इलाके की टोह लेने के बाद दोपहर में एक-एक कंपनी करके वापस श्रीनगर एयरफील्ड की ओर लौटना था। अन्य कंपनियों की वापसी दोपहर 14:00 बजे शुरू हुई, जबकि मेजर शर्मा को आदेश दिया गया था कि वे अपनी कंपनी के साथ सबसे अंत में, 15:00 बजे तक वापसी करेंगे । दोपहर के 14:00 बजे तक मोर्चा पूरी तरह शांत था और कोई बड़ी शत्रु गतिविधि नहीं देखी गई थी।
सामरिक धोखा (Diversion) और विषम घेराबंदी
युद्ध की वास्तविकता अक्सर शांति के आवरण में छिपी होती है। दोपहर लगभग 14:30 बजे, जब मेजर शर्मा की कंपनी वापसी की तैयारी कर रही थी, तभी बड़गाम गाँव के भीतर कुछ अस्वाभाविक हलचल दिखाई दी । स्थानीय निवासियों के घरों के बीच से भारतीय सैनिकों पर छिटपुट और असंगठित गोलीबारी शुरू हुई ।
एक परिपक्व और मानवीय रणनीतिकार के रूप में, मेजर शर्मा ने तुरंत अपनी कंपनी को अंधाधुंध जवाबी गोलीबारी करने से रोक दिया । उनका तर्क था कि इस गोलीबारी की आड़ में निर्दोष नागरिकों की जान जा सकती है, और वे किसी भी हाल में कश्मीरी अवाम को नुकसान नहीं पहुँचाना चाहते थे । हालांकि, यह केवल एक मानवीय निर्णय नहीं था, बल्कि एक गहरी सामरिक समझ का परिणाम था। शर्मा ने अपने सैन्य अनुभव से शीघ्र ही यह भाँप लिया कि गाँव के भीतर की यह छिटपुट हलचल दुश्मन की मुख्य रणनीति नहीं थी। यह केवल एक ‘डायवर्जन’ (Diversionary tactic), जिसका मुख्य उद्देश्य भारतीय सेना का ध्यान भटकाना और उन्हें एक दिशा में उलझाकर रखना था ।
मेजर शर्मा का यह सामरिक आकलन सौ प्रतिशत सटीक साबित हुआ। असली और विनाशकारी खतरा पश्चिम दिशा से आ रहा था। गाँव की ओट से अचानक लगभग 700 से 1,000 पश्तून कबायलियों और पाकिस्तानी अनियमित लड़ाकों के एक भारी हथियारों से लैस ‘लश्कर’ ने 3 इंच के मोर्टार, हल्की मशीनगनों (LMGs) और राइफलों के साथ मेजर शर्मा की कंपनी पर तीन तरफ से एक भीषण और समन्वित हमला कर दिया ।
भारतीय सेना की वह छोटी सी टुकड़ी अचानक एक अत्यंत विषम परिस्थिति में फँस गई थी। संख्या बल में वे 1 के मुकाबले 7 के अनुपात (लगभग 50-70 भारतीय सैनिक बनाम 700-1000 भारी हथियारों से लैस हमलावर) से घिर चुके थे ।
| सैन्य बल का प्रकार | 4 कुमाऊं (भारतीय सेना- D/A कंपनी) | पाकिस्तानी कबायली लश्कर |
| अनुमानित संख्या बल | 50-70 सैनिक (एक कंपनी) | 700-1000 लड़ाके |
| प्रयुक्त प्रमुख शस्त्रागार | हल्की मशीनगनें (LMGs), राइफलें, सीमित गोला-बारूद | 3-इंच और 2-इंच मोर्टार, भारी मशीनगनें, राइफलें |
| भौगोलिक स्थिति | बड़गाम के दक्षिण में खुले मोर्चे पर | तीन तरफ से घेराबंदी |
| हताहत (Casualties) | 15-22 सैनिक वीरगति को प्राप्त, 26 घायल | 200 से अधिक मृत, 320+ घायल |
शौर्य: एक हाथ से भरी मैगजीन, मौत के बीच वायुसेना को दिया सिग्नल
इस अचानक, भारी और सघन गोलाबारी के कारण कुमाऊं रेजीमेंट की अग्रिम पंक्तियों (Forward platoons) को भारी नुकसान उठाना पड़ा और कई जवान हताहत हुए । मेजर शर्मा भली-भांति जानते थे कि अगर उनकी पोस्ट गिर गई या उन्होंने एक कदम भी पीछे खींचा, तो दुश्मन के ये 1000 लड़ाके कुछ ही मिनटों में श्रीनगर हवाई अड्डे पर कब्ज़ा कर लेंगे, और वह संपूर्ण कश्मीर के पतन का कारण बनेगा ।
शत्रु की सटीक मोर्टार फायरिंग के बीच, जहाँ एक ओर छर्रे और गोलियों की बारिश हो रही थी, वहीं मेजर शर्मा खुले मैदान में अपनी खाइयों (Trenches) के बीच लगातार दौड़-दौड़ कर अपने सैनिकों का मनोबल बढ़ा रहे थे । वे अपनी जान की परवाह किए बिना दुश्मन की भीषण गोलीबारी के सामने स्वयं को उजागर करते हुए एक सेक्शन से दूसरे सेक्शन तक भागते और अपने मशीनगनरों को निर्देश देते रहे ।
जब शत्रु के मोर्टार हमलों के कारण भारतीय सैनिकों की संख्या तेजी से कम होने लगी और ‘लाइट ऑटोमैटिक्स’ (हल्की मशीनगनों) को संचालित करने वाले जवान वीरगति को प्राप्त होने लगे, तो शर्मा ने स्थिति की भयंकरता को समझा। गोलाबारी की गति बनाए रखना ही उस विशाल सेना को रोकने का एकमात्र उपाय था। उनके बाएँ हाथ पर प्लास्टर बंधा हुआ था और वह पूरी तरह से निष्क्रिय था, लेकिन इस शारीरिक विकलांगता को पूरी तरह दरकिनार करते हुए, उन्होंने एक अद्भुत पराक्रम दिखाया। उन्होंने स्वयं ही बंदूकों की खाली मैगज़ीनें भरनी शुरू कर दीं । केवल अपने दाहिने हाथ और शरीर के सहारे, प्लास्टर लगे बाएं हाथ के बावजूद, वह गोलियों से मैगजीन भरते और भारी गोलाबारी के बीच रेंगते हुए अपने लाइट मशीनगनरों तक गोला-बारूद पहुँचाते रहे । यह दृश्य उनके सैनिकों के लिए इतना प्रेरणादायक था कि घायल होने के बावजूद जवानों ने अपनी मशीनगनें नहीं छोड़ीं।
इसी बीच, मेजर शर्मा ने अपने सैन्य जीवन का सबसे दुस्साहसिक और सामरिक रूप से सबसे चतुर कार्य किया। भारतीय वायु सेना के विमान हवाई समर्थन के लिए युद्धक्षेत्र के ऊपर मंडरा रहे थे, लेकिन नीचे शत्रु की सटीक स्थिति स्पष्ट नहीं थी क्योंकि हमलावर खाइयों और पेड़ों की आड़ में थे। वायु सेना को सटीक लक्ष्य प्रदान करने के लिए, मेजर शर्मा ने दुश्मन की आँखों के ठीक सामने, भारी गोलाबारी के बीच खुले मैदान में कपड़े की पट्टियाँ (Cloth airstrips) बिछाईं । यह एक ऐसा कृत्य था जिसमें मृत्यु लगभग निश्चित थी, लेकिन इसी के कारण वायु सेना के लड़ाकू विमानों को वह सटीक लक्ष्य मिल गया जिससे उन्होंने पाकिस्तानी लश्करों पर कहर बरपा दिया ।
बलिदान: ‘एक इंच पीछे नहीं हटूंगा’ – वो आखिरी रेडियो संदेश
लड़ाई अब अत्यंत क्रूर हो चुकी थी और दुश्मन लगातार करीब आ रहा था। दोनों पक्षों के बीच की दूरी कम होती जा रही थी। तभी दुश्मन के मोर्टार का एक गोला उस गोला-बारूद के ढेर के ठीक बीच में आकर गिरा जहाँ मेजर सोमनाथ शर्मा स्वयं बैठकर मशीनगनों की मैगज़ीन भर रहे थे । इस भयानक विस्फोट ने गोला-बारूद के ढेर में आग लगा दी, और 24 वर्षीय (लगभग 25 वर्ष) मेजर सोमनाथ शर्मा वीरगति को प्राप्त हुए ।
वीरगति को प्राप्त होने से कुछ क्षण पूर्व ही, जब उन्हें आभास हो गया था कि स्थिति अत्यंत विकट है, उन्होंने ब्रिगेड मुख्यालय को रेडियो पर अपना अंतिम और ऐतिहासिक संदेश प्रेषित किया था। यह संदेश आज भी भारतीय सेना के स्वर्णिम अक्षरों में दर्ज है और हर सैनिक की प्रेरणा का स्रोत है:
“The enemy is only 50 yards from us. We are heavily outnumbered. We are under devastating fire. I shall not withdraw an inch but will fight to the last man and the last round.“
(अनुवाद: “दुश्मन हमसे केवल 50 गज की दूरी पर है। हमारी संख्या उनके मुकाबले बहुत कम है। हम विनाशकारी गोलीबारी की चपेट में हैं। मैं एक इंच भी पीछे नहीं हटूंगा और आखिरी आदमी और आखिरी गोली तक लड़ूंगा।”)
एक महान नेता का प्रभाव उसकी मृत्यु के बाद सबसे अधिक दिखाई देता है। मेजर शर्मा के इस सर्वोच्च बलिदान और उनके द्वारा प्रदर्शित अकल्पनीय शौर्य ने उनकी कंपनी के बाकी बचे और घायल सैनिकों के भीतर एक ऐसी अदम्य ऊर्जा, क्रोध और प्रेरणा का संचार किया कि मेजर शर्मा की मृत्यु के बाद भी वे सैनिक अगले कई घंटों तक उस विशाल शत्रु सेना से लड़ते रहे । जब तक वे लगभग पूरी तरह से घिर नहीं गए, तब तक किसी ने अपनी पोस्ट नहीं छोड़ी।
इस अद्भुत प्रतिरोध ने पाकिस्तानी लश्कर को 6 महत्वपूर्ण घंटों तक बड़गाम में ही उलझाए रखा । युद्ध की रणनीति में समय ही सबसे बड़ा अस्त्र होता है। इन 6 घंटों के विलंब ने ही कश्मीर का संपूर्ण इतिहास बदल दिया, क्योंकि इसी दौरान भारतीय वायु सेना ने हवाई अड्डे पर अतिरिक्त सैनिकों को उतार दिया, जिन्होंने हवाई अड्डे को पूरी तरह से सुरक्षित कर लिया और श्रीनगर के सभी प्रवेश मार्गों को अचूक रूप से सील कर दिया ।
प्रहार: आसमान से बरसी मौत और भाग खड़े हुए कबायली
बड़गाम की इस ऐतिहासिक लड़ाई के विश्लेषण में थल सेना के प्रयासों के पूरक के रूप में भारतीय वायु सेना (IAF) की महत्वपूर्ण भूमिका का उल्लेख करना अपरिहार्य है । केवल सैनिकों के परिवहन (Dakota DC-3 द्वारा) तक सीमित न रहकर, वायु सेना ने युद्ध के मैदान में सीधे हस्तक्षेप किया।
मेजर शर्मा द्वारा अदम्य साहस का परिचय देते हुए कपड़े की पट्टियों से शत्रु को लक्षित किए जाने के बाद, IAF के लड़ाकू विमानों विशेष रूप से स्पिटफायर (Spitfires), हार्वर्ड (Harvard’s) और टेम्पेस्ट (Tempests) ने कबायली लश्करों पर सटीक बमबारी और स्ट्रेफिंग (Strafing) की । ऐतिहासिक दस्तावेज़ स्पष्ट करते हैं कि पाकिस्तानी लश्कर के जो 200 से अधिक लड़ाके मारे गए थे और 320 से अधिक घायल हुए थे, उनमें से अधिकांश हताहत वायु सेना के इसी सामरिक और सटीक हस्तक्षेप के कारण हुए थे ।
इस हवाई बमबारी का एक और बड़ा सामरिक परिणाम यह हुआ कि लश्कर का प्रमुख कमांडर, खुर्शीद अनवर (Khurshid Anwar), पैर में गोली लगने से गंभीर रूप से घायल हो गया । कमांडर के घायल होने, वायु सेना के निरंतर हमलों और 4 कुमाऊं के अकल्पनीय प्रतिरोध के कारण हमलावरों का नेतृत्व चरमरा गया। उनका मनोबल टूट गया और उनके आगे बढ़ने की गति हमेशा के लिए रुक गई । उसी रात वे हवाई अड्डे की कमजोरियों का फायदा उठाने में विफल रहे, और अगली सुबह तक भारत ने स्थिति पर पूर्ण नियंत्रण प्राप्त कर लिया था।
अहम सवाल: अगर उस दिन मेजर सोमनाथ न रोकते तो आज कैसा होता कश्मीर?
रणनीतिक विश्लेषक और सैन्य इतिहासकार अक्सर इतिहास के प्रति-तथ्यात्मक (Counterfactual) पहलुओं का अध्ययन करते हैं ताकि किसी विशिष्ट घटना के वास्तविक महत्व और उसके दीर्घकालिक प्रभावों का सटीक आकलन किया जा सके। इस संदर्भ में सबसे बड़ा प्रश्न यह है: यदि 3 नवंबर 1947 को मेजर सोमनाथ शर्मा ने अपनी पोस्ट छोड़ दी होती, या यदि वे 6 घंटे का वह सामरिक विलंब सुनिश्चित न कर पाते, तो आज कश्मीर और भारत का नक्शा कैसा होता?
- श्रीनगर पर पाकिस्तान का कब्जा?: बड़गाम से श्रीनगर हवाई अड्डे की दूरी मात्र 5-10 किलोमीटर थी। यदि मेजर शर्मा पीछे हट जाते, तो हवाई अड्डे पर तुरंत कब्ज़ा हो जाता। हवाई अड्डे के पतन के बाद, 1000 से अधिक हथियारबंद कबायली लड़ाके सीधे श्रीनगर शहर में प्रवेश कर जाते। महाराजा हरि सिंह की सरकार का अंतिम प्रतीक ढह जाता।
- टूट जाती सेना की ‘लाइफलाइन’: भारतीय सेना के लिए हवाई अड्डे के बिना रसद और कुमुक पहुंचाने का कोई विकल्प नहीं था। पंजाब से जम्मू होते हुए श्रीनगर तक का सड़क मार्ग सर्दियों के कारण लगभग दुर्गम और असुरक्षित था। जो भारतीय सैनिक पहले ही घाटी में पहुंच चुके थे, वे बिना रसद और हवाई समर्थन के मार दिए जाते। भारतीय रक्षा तंत्र पूरी तरह से पंगु हो जाता।
- बारामूला जैसी हैवानियत: बारामूला में घुसपैठियों द्वारा किए गए अकल्पनीय अत्याचारों, जिसमें अस्पतालों को जलाना, सामूहिक दुष्कर्म, और व्यापक लूटपाट शामिल था, जिसको देखते हुए, यह स्पष्ट है कि श्रीनगर में बड़े पैमाने पर मानवीय तबाही होती। शहर की जनसांख्यिकी को बलपूर्वक बदल दिया जाता।
- हमेशा के लिए बदल जाता भारत का नक्शा: यदि पाकिस्तान 1947 में ही श्रीनगर और कश्मीर घाटी पर पूर्ण अधिकार कर लेता, तो आज ‘नियंत्रण रेखा’ (Line of Control – LoC) का स्वरूप बिल्कुल अलग होता। जम्मू-कश्मीर राज्य का वह हिस्सा जिसमें कश्मीर घाटी, लद्दाख का अधिकांश भाग और सियाचिन ग्लेशियर शामिल है, जो आज भारत का अभिन्न अंग है (लगभग 55% भूभाग) वह पूरी तरह से
पाकिस्तान के नियंत्रण में होता। - चीन और मध्य एशिया से कट जाता भारत: कश्मीर घाटी और लद्दाख के पतन का अर्थ था कि भारत की सीमाएं अक्साई चिन (Aksai Chin) और मध्य एशिया से पूरी तरह कट जातीं। चीन के साथ भारत के सामरिक समीकरण और पूरे दक्षिण एशिया के शक्ति-संतुलन (Balance of Power) को हमेशा के लिए भारत के विरुद्ध कर दिया जाता। गिलगित-बाल्टिस्तान के साथ-साथ पूरी कश्मीर घाटी पर पाकिस्तान का कब्जा भारत को एक स्थायी रणनीतिक नुकसान में धकेल देता।
इसलिए यह कोई अतिशयोक्ति या भावनात्मक कथन नहीं है कि मेजर सोमनाथ शर्मा और उनके मुट्ठी भर जवानों ने 3 नवंबर 1947 को केवल एक हवाई अड्डे को नहीं बचाया था, बल्कि उन्होंने कश्मीर के भौगोलिक और राजनीतिक मानचित्र को पुनः आकलित होने से रोक दिया था। उनका वह स्टैंड ही वह धागा था जिसने कश्मीर को भारत से जोड़े रखा।
पहचान: जेब में मिली ‘श्रीमद्भगवद्गीता’ और पिस्तौल का खाली होल्स्टर
बड़गाम युद्ध की समाप्ति के तीन दिन बाद, जब भारतीय सेना ने उस क्षेत्र को पूरी तरह से सुरक्षित कर लिया, तब युद्ध के मैदान से मेजर सोमनाथ शर्मा का पार्थिव शरीर बरामद किया गया । मोर्टार के सीधे विस्फोट और तीन दिन तक खुले में पड़े रहने के कारण उनका शरीर इतनी बुरी तरह से क्षत-विक्षत हो चुका था कि उसे पहचानना लगभग असंभव था ।
उनकी पहचान उनके कपड़ों में मिली दो विशिष्ट चीजों से की गई। पहली, उनकी छाती की जेब में रखी ‘श्रीमद्भगवद्गीता’ के कुछ पन्ने, और दूसरी, उनके मित्र मेजर के.के. तिवारी (K.K. Tewari) की पिस्तौल का खाली चमड़े का होल्स्टर (Holster) (पिस्तौल वहां मौजूद नहीं थी) ।
यह श्रीमद्भगवद्गीता ही थी जिसने उन्हें बचपन से प्रेरित किया था। वे अक्सर अपने दादाजी से गीता के उपदेश सुना करते थे । भगवान कृष्ण द्वारा कुरुक्षेत्र के युद्ध में अर्जुन को दिए गए आत्मा की अमरता और शरीर की नश्वरता के ज्ञान ने युवा सोमनाथ के मन से मृत्यु का भय पूरी तरह से समाप्त कर दिया था । युद्ध में जाने से पूर्व उन्होंने अपने पिता को लिखे एक पत्र में गीता का ही संदर्भ देते हुए कहा था कि उन्हें मृत्यु का कोई भय नहीं है और यदि वे मरते हैं, तो एक वीर सैनिक की मौत मरेंगे । उन्होंने सिद्ध कर दिया कि उनके लिए उनका शरीर केवल एक आवरण था, जबकि उनका आत्मा और उनका कर्तव्य अमर था ।
संयोग: समधिन ने डिजाइन किया परमवीर चक्र और दामाद का भाई बना पहला विजेता
21 जून 1950 को, भारत के राजपत्र (Gazette Notification: 2 Pres/50) के माध्यम से मेजर सोमनाथ शर्मा को 3 नवंबर 1947 के उनके असाधारण नेतृत्व और बहादुरी के लिए मरणोपरांत भारत के पहले ‘परमवीर चक्र’ (Param Vir Chakra) से सम्मानित किया गया । यह भारत का सर्वोच्च सैन्य अलंकरण था, जिसे युद्धकाल में दुश्मन के सामने प्रदर्शित की गई सबसे विशिष्ट वीरता के लिए स्थापित किया गया था (यह 26 जनवरी 1950 को स्थापित हुआ था, लेकिन इसे 15 अगस्त 1947 से पूर्वव्यापी प्रभाव से लागू किया गया) ।
इस सर्वोच्च पदक के निर्माण और इसके प्रथम प्राप्तकर्ता से जुड़ा एक अत्यंत रोचक, भावुक और अद्वितीय ऐतिहासिक संयोग है। स्वतंत्र भारत के इस नए सैन्य अलंकरण को डिज़ाइन करने का अत्यंत महत्वपूर्ण दायित्व मेजर जनरल अटल द्वारा एक स्विस मूल की महिला, सावित्री बाई खानोलकर (Savitri Khanolkar) को सौंपा गया था । सावित्री खानोलकर का मूल नाम ‘ईव यवोन मडे डे मारोस’ (Eve Yvonne Maday de Maros) था। उनका जन्म स्विट्जरलैंड में एक हंगेरियन पिता और रूसी माँ के घर हुआ था । उन्होंने 1932 में भारतीय सेना के अधिकारी विक्रम खानोलकर (सिख रेजीमेंट) से विवाह किया था और पूरी तरह से भारतीय संस्कृति को अपना लिया था । भारतीय संस्कृति, वेदों तथा पुराणों का उनका ज्ञान अत्यंत गहरा था ।
सावित्री खानोलकर ने इस पदक का डिज़ाइन प्राचीन भारतीय पौराणिक कथाओं के सबसे महान त्यागी महर्षि दधीचि के बलिदान से प्रेरित होकर बनाया । महर्षि दधीचि ने देवराज इंद्र के अस्त्र ‘वज्र’ (Vajra – Thunderbolt) के निर्माण के लिए अपनी अस्थियों का दान कर दिया था ताकि बुराई (वृत्रासुर) का नाश किया जा सके । कांस्य से निर्मित इस पदक के केंद्र में राज्य प्रतीक और उसके चारों ओर इंद्र के वज्र की चार प्रतिकृतियां उकेरी गईं ।
एक अविश्वसनीय और हृदयस्पर्शी संयोग यह रहा कि सावित्री खानोलकर द्वारा डिज़ाइन किया गया यह प्रथम परमवीर चक्र किसी और को नहीं, बल्कि उनकी अपनी ही बड़ी पुत्री कुमुदिनी शर्मा (जिन्होंने सोमनाथ शर्मा के भाई सुरिंदर नाथ शर्मा से विवाह किया था) के देवर (Brother-in-law) यानी मेजर सोमनाथ शर्मा को ही प्रदान किया गया । मेजर शर्मा सचमुच आधुनिक युग के महर्षि दधीचि बन गए थे, जिन्होंने राष्ट्र की रक्षा के लिए अपनी अस्थियों और अपने जीवन का स्वेच्छा से बलिदान दे दिया था ।
भविष्यवाणी: या तो परमवीर बनूंगा या आर्मी चीफ
मेजर सोमनाथ शर्मा की शहादत से कुछ ही समय पहले, कश्मीर जाने के लिए उड़ान भरने से पूर्व, उन्होंने अपने मित्र मेजर के.के. तिवारी से एक हल्की-फुल्की बातचीत में मज़ाक में कहा था कि “या तो मैं मर जाऊंगा और विक्टोरिया क्रॉस जीतूंगा, या फिर सेना प्रमुख बनूंगा”।
नियति का यह कैसा खेल था कि उनके दोनों कथन सत्य सिद्ध हुए। उन्होंने मृत्यु का आलिंगन करके स्वतंत्र भारत का सर्वोच्च सैन्य पदक परमवीर चक्र (जो ब्रिटिश काल के विक्टोरिया क्रॉस के समकक्ष है) प्राप्त किया, और उनका छोटा भाई (जनरल वी.एन. शर्मा) 1988 में उसी भारतीय सेना का प्रमुख (Chief of Army Staff) बना ।
राष्ट्र ने इस प्रथम परमवीर को अमर बनाने के लिए कई महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं:
- परमवीर दीर्घा (Param Vir Dirgha): 16 दिसंबर 2025 (विजय दिवस) को भारत की राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू द्वारा राष्ट्रपति भवन में ‘परमवीर दीर्घा’ का ऐतिहासिक उद्घाटन किया गया। जहाँ कभी ब्रिटिश सैन्य अधिकारियों (ADCs) के चित्र लगे होते थे, वहां अब मेजर शर्मा सहित सभी 21 परमवीर चक्र विजेताओं के चित्र स्थापित किए गए हैं। यह दीर्घा प्रकाश, स्थान और मौन के माध्यम से इन नायकों के अदम्य साहस को परिलक्षित करती है ।
- शिपिंग कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया (SCI): राष्ट्र की एक महत्वपूर्ण कृतज्ञता के रूप में, शिपिंग कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया ने अपने 15 कच्चे तेल के टैंकरों का नाम परमवीर चक्र विजेताओं के नाम पर रखा। इस बेड़े के पहले टैंकर का नाम ‘एमटी मेजर सोमनाथ शर्मा, पीवीसी’ (MT Major Somnath Sharma, PVC – IMO No. 8224107) रखा गया, जिसे 11 जून 1984 को कमीशन किया गया था ।
- सोम विहार: देश की राजधानी नई दिल्ली में सेना के जवानों और अधिकारियों के लिए एक प्रमुख आवासीय परियोजना का नाम उनके सम्मान में ‘सोम विहार’ (Som Vihar) रखा गया है ।
- राष्ट्रीय युद्ध स्मारक और अंडमान द्वीप: नई दिल्ली स्थित राष्ट्रीय युद्ध स्मारक (National War Memorial) में उनका नाम परम योद्धाओं की सूची में सबसे ऊपर सुनहरे अक्षरों में अंकित है । इसके अतिरिक्त, अंडमान तथा निकोबार द्वीप समूह के 21 निर्जन द्वीपों के ऐतिहासिक नामकरण में एक प्रमुख द्वीप को उनका नाम देकर सम्मानित किया गया है।
- अन्य स्मारक: रानीखेत में कुमाऊं रेजीमेंट के युद्ध स्मारक के प्रवेश द्वार का नाम ‘सोमनाथ द्वार’ रखा गया है, और देहरादून स्थित भारतीय सैन्य अकादमी (IMA) की वार्षिक क्रॉस-कंट्री रेस उनके नाम पर आयोजित की जाती है, जो कैडेटों को उनकी सीमाओं से परे जाने के लिए प्रेरित करती है ।
अंतिम सत्य: वो 6 घंटे जिन्होंने बदल दिया भारत का भूगोल
रणनीतिक इतिहास और सैन्य विज्ञान के पन्नों में ऐसी बहुत कम घटनाएं दर्ज होती हैं जहाँ एक एकल और अत्यंत सीमित सैन्य दल का दृढ़ संकल्प किसी विशाल युद्ध-योजना के परिणाम को पूरी तरह से पलट देता है। 3 नवंबर 1947 का दिन भारतीय सैन्य इतिहास का एक ऐसा ही अद्वितीय और मील का पत्थर है। मेजर सोमनाथ शर्मा और 4 कुमाऊं की ‘डी’ कंपनी के मुट्ठी भर जवानों ने बड़गाम के खुले मैदानों में जिस अप्रतिम शौर्य, सामरिक कुशाग्रता और अडिग दृढ़ता का प्रदर्शन किया, वह केवल सैन्य रणनीति का एक उत्कृष्ट हिस्सा नहीं था, बल्कि यह एक नवगठित राष्ट्र के प्रति असीम समर्पण की पराकाष्ठा थी।
शत्रु के 1000 भारी हथियारों से लैस क्रूर लड़ाकों के समक्ष मात्र 50 सैनिकों के साथ दीवार बनकर खड़ा रहना, एक हाथ पर प्लास्टर बंधे होने और अत्यधिक शारीरिक पीड़ा के बावजूद मशीनगनों की मैगज़ीनें लगातार भरना, दुश्मन की आँखों के ठीक सामने हवाई पट्टी के कपड़े बिछाकर वायु सेना को लक्ष्य देना, और अपनी अंतिम सांस तक एक इंच भी पीछे न हटने का संकल्प लेना ये सभी असाधारण कृत्य मेजर सोमनाथ शर्मा को एक साधारण सैन्य अधिकारी से उठाकर एक चिरस्थायी मिथक (Legend) और सैन्य आदर्श में बदल देते हैं।
यदि बड़गाम के उस खूनी संघर्ष में वह 6 घंटे का अमूल्य सामरिक समय नहीं खरीदा गया होता, तो इस बात में कोई कूटनीतिक या ऐतिहासिक संदेह नहीं है कि श्रीनगर हवाई अड्डा उसी दिन पाकिस्तानी सेना और कबायलियों के हाथों में गिर गया होता। कुमुक और रसद के अभाव में कश्मीर की रक्षा पूरी तरह से असंभव हो जाती और आज भारत का भौगोलिक नक्शा कश्मीर के बिना अपूर्ण और सामरिक रूप से अत्यंत असुरक्षित होता। मेजर सोमनाथ शर्मा का वह अंतिम रेडियो संदेश “मैं एक इंच भी पीछे नहीं हटूंगा और आखिरी आदमी और आखिरी गोली तक लड़ूंगा” केवल ब्रिगेड मुख्यालय को दिया गया एक सामरिक अपडेट नहीं था; यह स्वतंत्र भारत की सेना का वह पहला और सबसे शक्तिशाली उद्घोष था, जिसने भविष्य की पीढ़ियों के लिए कर्तव्य, अदम्य साहस और सर्वोच्च बलिदान का एक ऐसा लौह मानक स्थापित किया, जिसकी बराबरी कर पाना विश्व के सैन्य इतिहास में विरले ही संभव है। यह राष्ट्र उनके इस बलिदान, उस टूटे हुए हाथ के अडिग साहस, और उस दूरदर्शिता का सदैव ऋणी रहेगा जिसने कश्मीर को भारत का मुकुट और एक अभिन्न अंग बनाए रखा।
जय हिंद!
