भैरव हिंदू परंपरा में वह देवता जो भय का नाश करते हैं, जो रक्षकों के रक्षक हैं। अब यही नाम भारतीय सेना की उस नई और खतरनाक ताकत को मिला है, जो दुश्मन के लिए सच में ‘काल’ बनकर उभरी है। इसका नाम है ‘भैरव कमांडो बटालियन’।
गलवान जैसी हिमाकत भूल जाएगा चीन
जून 2020 की वह रात जब गलवान घाटी में चीनी सैनिकों ने धोखे से हमला किया। कर्नल संतोष बाबू और उनके 19 साथी वीरगति को प्राप्त हुए। लेकिन भारत ने भी उस रात चीन को ऐसा सबक सिखाया जो उसे आज तक याद है चीन के 40 से ज़्यादा सैनिक मारे गए, जो बात वह आज तक कबूल नहीं कर पाया।
उस घटना ने भारतीय सेना के सामने एक सवाल खड़ा किया अगर दुश्मन अचानक, हाथापाई के साथ, बिना हथियार के वार करे तो क्या हमारे पास उसका तुरंत और निर्णायक जवाब है? इसी सवाल का जवाब है ‘भैरव बटालियन।’
क्यों बनी यह बटालियन?
ऑपरेशन सिंदूर और दुनियाभर के हाल के युद्धों से एक बड़ा सबक मिला आधुनिक जंग में जीत उसे मिलती है जो तेज़ है, लचीला है और सटीक है। न भारी-भरकम फौज, न लंबा इंतज़ार। दुश्मन आए और जवाब तुरंत मिले यही सोच ‘भैरव’ के पीछे है।
भारतीय सेना ने महसूस किया कि आम पैदल सेना और एलीट स्पेशल फोर्स के बीच एक बड़ा फासला है। ‘भैरव बटालियन’ इसी फासले को पाटने के लिए बनाई गई है एक ऐसी फुर्तीली, घातक और आधुनिक ताकत जो पहाड़ हो, रेगिस्तान हो या घना जंगल, हर जगह तेज़ी से पहुँचकर दुश्मन को चकनाचूर कर सके।
ये कमांडो अलग मिट्टी के बने हैं
‘भैरव’ के जवान आम सैनिक नहीं हैं। सेना की 415 पैदल सेना बटालियनों में से सबसे तेज़, सबसे मज़बूत और सबसे काबिल सैनिकों को छाँटकर इन बटालियनों में शामिल किया गया है। यह छँटाई ऐसी है जैसे लाखों पत्थरों में से हीरा चुनना।
इन्हें तीन महीने का ऐसा कठोर कमांडो प्रशिक्षण दिया जाता है, जहाँ शून्य से 40 डिग्री नीचे के तापमान में भी शरीर थकता नहीं बल्कि और धारदार हो जाता है। इसके बाद एक महीने तक स्पेशल फोर्सेज़ के साथ काम करते हुए ये असली जंग की बारीकियाँ सीखते हैं।
और सबसे अहम बात इनके हाथ ही हथियार की तरह काम करते हैं। करीबी लड़ाई (hand-to-hand combat) में ये इतने माहिर हैं कि दुश्मन को हथियार की ज़रूरत तक नहीं पड़ने देते। और जब उन्हीं लोहे जैसे हाथों में आधुनिक हथियार, ड्रोन और AI आधारित संचार तंत्र आ जाता है तो यह संयोग किसी भी दुश्मन के लिए बुरे सपने से कम नहीं।

चीन को सीधी चेतावनी
LAC पर ‘भैरव बटालियन’ की तैनाती महज़ एक सैन्य कदम नहीं, यह बीजिंग को एक खुला संदेश है गलवान जैसी गुस्ताखी अब माफ नहीं होगी।
2020 में चीनी सैनिक इस भरोसे से आए थे कि रात के अँधेरे में, बर्फीली घाटी में, करीबी लड़ाई में वे हावी हो जाएँगे। लेकिन आज जब LAC पर ‘भैरव’ तैनात है तो वह पुराना हिसाब-किताब बदल चुका है।
चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (PLA) के पास ज़रूर बड़ी तादाद है, लेकिन ‘भैरव’ के पास वह जज़्बा है जो किसी मैनुअल में नहीं लिखा जाता। इसके अलावा “मिट्टी के लाल” यानी “संस ऑफ द सॉइल” की अवधारणा के तहत लद्दाख में तैनात बटालियन में लद्दाखी मूल के जवानों को प्राथमिकता दी गई है। ये जवान उस पहाड़ को, उस बर्फ को, उस हवा को अपनी साँसों की तरह जानते हैं और यही उनकी सबसे बड़ी ताकत है।
कहाँ-कहाँ तैनात है ‘भैरव’?
अगस्त-सितंबर 2025 में पहली पाँच बटालियनों का गठन शुरू हुआ। तैनाती इस प्रकार है
पहली बटालियन लेह स्थित 14वीं कोर के अधीन सीधे चीन से लगी LAC पर। दूसरी श्रीनगर की 15वीं कोर और तीसरी नगरोटा की 16वीं कोर के लिए पाकिस्तान सीमा पर। चौथी पश्चिमी क्षेत्र के रेगिस्तान में और पाँचवीं पूर्वी क्षेत्र के पहाड़ी इलाकों में।
आगे चलकर कुल 23 से 25 भैरव बटालियनें देश के सबसे संवेदनशील सीमाओं की रखवाली करेंगी।
26 जनवरी 2026 जब दुनिया ने देखा ‘भैरव’ को
15 जनवरी 2026 को जयपुर में हुई सेना दिवस परेड और फिर गणतंत्र दिवस पर कर्तव्य पथ पर इन कमांडो की कदमताल ने दुनिया को बता दिया भारत का नया सैनिक रवायती तरीकों से आगे निकल चुका है।
दुश्मन के लिए एक ही संदेश
‘भैरव बटालियन’ यह सुनिश्चित करने के लिए बनाई गई है कि भारत की सीमा की तरफ नज़र उठाने का हौसला भी दुश्मन न कर पाए। न LAC पर, न LOC (नियंत्रण रेखा) पर, न किसी बर्फीली घाटी में।
क्योंकि अब वहाँ ‘भैरव’ है अदृश्य, अजेय और अडिग।
