परमाणु युद्ध की आहट: अमेरिका-इजराइल Vs ईरान के बीच छिड़ी भीषण जंग, क्या यह तीसरे विश्वयुद्ध की शुरुआत है?

28 फरवरी 2026 की सुबह, अमेरिका और इजराइल ने ईरान (USA Israel Iran War) पर एक बड़ा संयुक्त सैन्य हमला बोल दिया। इस ऑपरेशन को ‘ऑपरेशन शील्ड ऑफ जुडाह’ (Operation Shield of Judah) का नाम दिया गया। वहीं अमेरिका ने इसे ऑपरेशन एपिक फ्यूरी (Operation Epic Fury) का नाम दिया है। इजराइल ने ईरान के परमाणु ठिकानों, सैन्य अड्डों और बुनियादी ढांचे पर 200 से अधिक लड़ाकू विमानों से 330 से ज्यादा हमले किए। अमेरिका ने भी वायु और समुद्री रास्ते से ईरान पर हमले किए।

कैसे शुरु हुआ युद्ध ?

यह हमला ऐसे समय हुआ जब अमेरिका और ईरान के बीच जिनेवा में परमाणु कार्यक्रम को लेकर बातचीत चल रही थी। बातचीत बिना किसी नतीजे के खत्म होने के महज दो दिन बाद ही यह हमला हो गया। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इसे एक ‘बड़ा युद्ध अभियान’ करार दिया।

ईरान ने तुरंत जवाबी कार्रवाई की और इजराइल पर मिसाइलें दागीं। साथ ही मध्य पूर्व में अमेरिकी सैन्य अड्डों  कतर, बहरीन, कुवैत, संयुक्त अरब अमीरात और सऊदी अरब  को भी निशाना बनाया।

अमेरिका-इजराइल बनाम ईरान युद्ध का कारण क्या है?

इस युद्ध का सबसे बड़ा कारण ईरान का परमाणु कार्यक्रम है। मई 2025 में IAEA (अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी) ने रिपोर्ट दी कि ईरान के पास 60% तक समृद्ध यूरेनियम का इतना बड़ा भंडार है जिससे नौ परमाणु हथियार बनाए जा सकते हैं। इसराइली प्रधानमंत्री नेतन्याहू ने कहा कि ईरान कुछ ही महीनों में परमाणु बम बना सकता है।

जून 2025 के युद्ध में इजराइल और अमेरिका ने मिलकर ईरान की वायु सुरक्षा प्रणाली को लगभग पूरी तरह नष्ट कर दिया था। हमास और हिजबुल्ला जैसे ईरान समर्थित संगठनों को भारी नुकसान हुआ था। सीरिया में असद सरकार गिर चुकी थी। इन सबके चलते ईरान 1979 की इस्लामी क्रांति के बाद अपनी सबसे कमजोर स्थिति में था।

राष्ट्रपति ट्रंप ने सत्ता में लौटते ही ईरान पर ‘अधिकतम दबाव’ की नीति फिर से लागू की। उन्होंने दो महीने की डेडलाइन दी थी  या तो परमाणु डील करो, या परिणाम भुगतो। जब ईरान ने अमेरिकी शर्तें नहीं मानीं, तो यह युद्ध अपरिहार्य हो गया।

इजराइल या ईरान- किस पक्ष का पलड़ा है भारी?

फिलहाल अमेरिका-इजराइल का पक्ष काफी मजबूत दिख रहा है। अमेरिका ने पूर्वी भूमध्य सागर में पांच अर्ले बर्क श्रेणी के विनाशक युद्धपोत तैनात किए हैं। इजराइल के पास F-35 जैसे उन्नत लड़ाकू विमान हैं और मोसाद की खुफिया टुकड़ियों ने ईरान की वायु सुरक्षा प्रणाली को पहले ही नष्ट कर दिया था। बंकर-बस्टर बमों ने नतांज, फोर्डो और इस्फहान जैसे गहरे भूमिगत परमाणु ठिकानों को निशाना बनाया।

दूसरी तरफ ईरान की स्थिति पिछले युद्ध से कमजोर हुई है। उसकी वायु सुरक्षा काफी हद तक नष्ट हो चुकी है। हालांकि ईरान के पास बैलिस्टिक मिसाइलों का बड़ा जखीरा है जिनसे वह इजराइल और खाड़ी देशों को लगातार निशाना बना रहा है। ईरान ने यह भी दावा किया है कि उसने होर्मुज जलडमरूमध्य बंद कर दिया है, जो एक बड़ा रणनीतिक कदम है।

किसे हुआ ज्यादा नुकसान ?

ईरानी रेड क्रिसेंट के अनुसार, प्रारंभिक हमलों में ही 201 से अधिक लोग मारे गए और 700 से ज्यादा घायल हुए। तेहरान, इस्फहान, कोम, कराज और केरमानशाह जैसे शहरों में भारी तबाही हुई। नतांज और फोर्डो परमाणु सुविधाएं बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गईं। दक्षिणी ईरान के मिनाब शहर में एक लड़कियों के स्कूल पर हमले में 40 से अधिक बच्चों के मारे जाने की खबर है जिसकी दुनिया भर में निंदा हुई। ईरान के कई वरिष्ठ IRGC कमांडर मारे गए।

इजराइल के अनुसार ईरानी मिसाइल हमलों में 28 लोगों की मौत हुई। बत यम में 61 इमारतें क्षतिग्रस्त हुईं और करीब 200 लोग घायल हुए। इजराइल का दावा है कि उसकी वायु सुरक्षा ने अधिकांश मिसाइलों को मार गिराया।

ईरान के जवाबी हमलों में कतर, बहरीन, यूएई और सऊदी अरब के कुछ इलाके भी प्रभावित हुए। बहरीन में अमेरिकी नेवी के 5वें बेड़े पर मिसाइल हमला हुआ। दुबई के अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे और कुवैत के एयरपोर्ट पर भी हमले हुए।

अमेरिका-इजराइल vs ईरान युद्ध कौन से हथियार हो रहे हैं इस्तेमाल ?

अमेरिका के हथियार

  • टॉमहॉक क्रूज मिसाइलें  लंबी दूरी के सटीक हमलों के लिए
  • GBU-57 ‘मासिव ऑर्डनेंस पेनेट्रेटर’  बंकर-बस्टर बम जो गहरे भूमिगत ठिकानों को नष्ट करते हैं
  • F-35 और F-15 लड़ाकू विमान
  • अर्ले बर्क श्रेणी के विनाशक युद्धपोतों से दागी जाने वाली मिसाइलें

इजराइल के हथियार

  • F-35I एडिर लड़ाकू विमान
  • जेरिको बैलिस्टिक मिसाइलें
  • आयरन डोम  छोटी दूरी की मिसाइलों को रोकने के लिए
  • डेविड्स स्लिंग  मध्यम दूरी के हमलों को रोकने के लिए
  • ऐरो-3  लंबी दूरी की बैलिस्टिक मिसाइलों को रोकने के लिए

ईरान के हथियार

  • शहाब-3 बैलिस्टिक मिसाइलें
  • सेज्जिल बैलिस्टिक मिसाइलें
  • शाहेद ड्रोन (कम लागत, बड़ी संख्या में इस्तेमाल)
  • एम्माद और घदर क्रूज मिसाइलें
  • फत्ताह हाइपरसोनिक मिसाइलें (जिनका हाल ही में परीक्षण हुआ)
  • हूती विद्रोहियों के जरिए यमन से इजराइल पर मिसाइलें

कौन किसके साथ है, यूएन (UN) का क्या रुख है?

ब्रिटेन, जर्मनी और फ्रांस ने प्रत्यक्ष सैन्य समर्थन तो नहीं दिया लेकिन ईरान के परमाणु कार्यक्रम की निंदा की है। सऊदी अरब, यूएई और कतर जैसे खाड़ी देशों ने ईरान के उनके देशों पर हुए हमलों की निंदा की है और परोक्ष रूप से अमेरिकी रुख का समर्थन किया है।

रूस ने अमेरिका और इजराइल के हमलों की कड़ी निंदा की है। चीन ने भी इसे अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन बताया है। हूती विद्रोहियों ने ईरान का साथ देते हुए इजराइल पर मिसाइलें दागी हैं।

फ्रांस के राष्ट्रपति मैक्रों ने यूएन सुरक्षा परिषद की तत्काल बैठक बुलाने की मांग की है। IAEA प्रमुख ने चेतावनी दी थी कि कूटनीतिक समाधान जरूरी है। लेकिन सुरक्षा परिषद में रूस और चीन की वीटो शक्ति के कारण किसी प्रभावी प्रस्ताव पर सहमति मुश्किल दिखती है।

भारत पर रणनीतिक और आर्थिक असर

भारत अपनी 85% से अधिक तेल जरूरतें आयात से पूरी करता है। हर महीने भारत में आने वाले कुल कच्चे तेल का करीब 50% होर्मुज जलडमरूमध्य से होकर आता है  यानी प्रतिदिन लगभग 26 लाख बैरल। अगर ईरान होर्मुज बंद करता है, तो यह भारत के लिए एक गंभीर संकट बन सकता है। तेल की बढ़ती कीमतें पेट्रोल, डीजल और एलपीजी को महंगा करेंगी और महंगाई पर सीधा असर पड़ेगा।

भारत ने ईरान के चाबहार बंदरगाह में भारी निवेश किया है जो मध्य एशिया और अफगानिस्तान तक भारत की पहुंच का रास्ता है। युद्ध के कारण यह परियोजना खतरे में पड़ सकती है। भारत के लिए यह एक कूटनीतिक दुविधा भी है  एक तरफ इजराइल और अमेरिका जिनके साथ मजबूत संबंध हैं, दूसरी तरफ ईरान जिसके साथ ऐतिहासिक और रणनीतिक सहयोग है।

इजराइल में करीब 20,000 और ईरान में लगभग 10,000 भारतीय नागरिक हैं। विदेश मंत्रालय ने ट्रैवल एडवाइजरी जारी की है। एयर इंडिया और इंडिगो ने खाड़ी देशों की उड़ानें रद्द कर दी हैं।

क्या विश्वयुद्ध या परमाणु युद्ध का खतरा है?

ईरान के पास अभी परमाणु हथियार नहीं हैं  यही इस युद्ध का मुख्य कारण है। अमेरिका और इजराइल दोनों परमाणु संपन्न हैं, लेकिन ईरान के खिलाफ इनका इस्तेमाल करना विनाशकारी और राजनीतिक रूप से असंभव होगा। इसलिए परमाणु युद्ध की संभावना अभी बहुत कम है।

रूस और चीन ने अभी तक सिर्फ कूटनीतिक निंदा तक खुद को सीमित रखा है। नाटो देश भी सीधे युद्ध में शामिल होने से बच रहे हैं। हालांकि अगर होर्मुज जलडमरूमध्य बंद हो गया, तेल की कीमतें 150 डॉलर प्रति बैरल को पार कर गईं, या किसी रणनीतिक गलती से रूस या चीन सीधे शामिल हो गए  तब स्थिति और विकराल हो सकती है।

अमेरिकी सीनेट में युद्ध शक्ति अधिनियम (War Powers Act) को लेकर बहस छिड़ी हुई है। डेमोक्रेट इसे ‘इराक युद्ध का दुःस्वप्न’ बता रहे हैं। राष्ट्रपति ट्रंप की लंबे युद्ध से बचने की छवि और इस युद्ध के बीच का विरोधाभास एक राजनीतिक पेचीदगी भी है।

संक्षेप में समझें

28 फरवरी 2026 को शुरू हुआ यह युद्ध दरअसल दशकों पुरानी दुश्मनी का एक विस्फोट है। इसकी जड़ें 2015 के ईरान परमाणु समझौते (JCPOA) के टूटने, 2023 में हमास के हमले, और उसके बाद की घटनाओं में हैं।

अमेरिका और इजराइल का तर्क है कि ईरान का परमाणु कार्यक्रम पूरे मध्य पूर्व के लिए खतरा है और इसे रोकना जरूरी था। ईरान का कहना है कि यह एक अवैध आक्रमण है और वह सिर्फ आत्मरक्षा में जवाब दे रहा है।

भारत के लिए यह युद्ध एक बड़ी कूटनीतिक और आर्थिक परीक्षा है। होर्मुज जलडमरूमध्य का भाग्य, तेल की कीमतें और भारत की ‘सामरिक स्वायत्तता’ की नीति  सब कुछ दांव पर है।

युद्ध का नतीजा अभी तय नहीं है। अगर जल्द कोई संघर्षविराम नहीं हुआ, तो यह संघर्ष वैश्विक अर्थव्यवस्था, तेल बाजार और मध्य पूर्व की राजनीति को वर्षों तक प्रभावित करेगा। दुनिया को इस आग की ओर से आंखें नहीं मोड़नी चाहिए  क्योंकि इसकी लपटें किसी एक देश की सीमाओं तक सीमित नहीं रहेंगी।

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