एक इंजन, जो दो बार भारत के हाथ से फिसल चुका है। एक लड़ाकू विमान, जिसकी डिलीवरी पहले ही दो साल पीछे चल सकती है। और एक वायुसेना प्रमुख, जिन्होंने खुलेआम कह दिया है कि सिर्फ “बड़ा” और “आधुनिक” होना अब काफी नहीं, अगर समय पर नहीं मिला, तो सबसे शानदार तकनीक भी बेकार है।
भारत का अगला फाइटर प्रोग्राम इसी तनाव के बीच आकार ले रहा है। एक ओर तेजस एमके2 को एमके1ए से आगे बढ़कर अधिक हथियार, अधिक ईंधन, बेहतर रेंज और एंड्योरेंस वाले मीडियम-वेट फाइटर के रूप में विकसित किया जा रहा है, वहीं दूसरी ओर कावेरी 2.0 के जरिए भारत एक बार फिर उस चुनौती पर लौट रहा है जिसने दशकों तक देश के फाइटर प्रोग्राम को विदेशी इंजन पर निर्भर बनाए रखा अपना हाई-थ्रस्ट फाइटर इंजन।
लेकिन इस महत्वाकांक्षी तस्वीर के ठीक बीचोबीच भारतीय वायुसेना ने एक कड़ी चेतावनी दी है, सिर्फ बेहतर तकनीक विकसित करना पर्याप्त नहीं है; उसे समय पर ऑपरेशनल सर्विस में पहुंचाना भी उतना ही जरूरी है। और तेजस एमके1ए की देरी ने दिखा दिया है कि यह चेतावनी कोई औपचारिकता नहीं, बल्कि अनुभव से निकली सीख है।

वायुसेना प्रमुख एयर चीफ मार्शल ए.पी. सिंह ने मई 2026 में फ्लाइट-टेस्ट अधिकारियों को संबोधित करते हुए स्वदेशी सैन्य प्रणालियों के लिए “डिजाइन-टू-डिलीवरी टाइम साइकिल” को बेहतर बनाने की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने साथ ही कहा कि विमान और प्रणालियों को वायुसेना की ऑपरेशनल जरूरतों को पूरा करना चाहिए। यह टिप्पणी ऐसे समय आई है जब तेजस एमके1ए की डिलीवरी में लगातार देरी ने भारतीय वायुसेना की फाइटर स्क्वाड्रन क्षमता पर दबाव बढ़ाया है।
यानी भारत के फाइटर प्रोग्राम के सामने अब दो समानांतर लक्ष्य हैं, तकनीकी आत्मनिर्भरता और समयबद्ध ऑपरेशनल डिलीवरी।
तेजस एमके2 को लेकर एयर चीफ का महत्वपूर्ण आकलन
तेजस एमके2 के महत्व को समझने के लिए एयर चीफ मार्शल ए.पी. सिंह की अक्टूबर 2025 की टिप्पणी महत्वपूर्ण है। उन्होंने एमके2 को एमके1ए का एक तरह का “विस्तार” बताते हुए कहा था कि यह बड़ा प्लेटफॉर्म होगा, अधिक हथियार ले जा सकेगा और रेंज तथा एंड्योरेंस के मामले में बेहतर प्रदर्शन करेगा। उन्होंने यह भी कहा था कि यह बड़े हथियार ले जाने में सक्षम होगा और इसलिए वायुसेना की जरूरतों के अनुरूप है।
यह टिप्पणी एमके2 की ऑपरेशनल पोजिशनिंग को समझने में महत्वपूर्ण है।
यानी वायुसेना के नजरिए से एमके2 का महत्व केवल इसलिए नहीं है कि यह तेजस एमके1ए से बड़ा होगा, बल्कि इसलिए है कि इसका आकार और क्षमता उसे अधिक व्यापक कॉम्बैट भूमिकाएं निभाने की अनुमति देगी।

एमके1ए से एमके2 तक कितना बड़ा बदलाव?
तेजस एमके1/एमके1ए को मूल रूप से हल्के लड़ाकू विमान के रूप में विकसित किया गया था। एमके2 में विमान का आकार बढ़ाया गया है और इसके साथ आंतरिक ईंधन, पेलोड, हथियार वहन क्षमता तथा एवियॉनिक्स के भविष्य में विस्तार के लिए अधिक जगह बनाई गई है।
एमके2 लगभग 17.5 टन अधिकतम टेक-ऑफ वजन श्रेणी में होगा और इसके लिए जीई एफ414 इंजन चुना गया है। एफ414 लगभग 98 किलोन्यूटन थ्रस्ट श्रेणी का आफ्टरबर्निंग टर्बोफैन है।
बड़े एयरफ्रेम का अर्थ केवल अधिक वजन उठाने की क्षमता नहीं है। इसके साथ विमान को अधिक आंतरिक ईंधन, ज्यादा हथियार, बड़े सेंसर और भविष्य के एवियॉनिक्स तथा इलेक्ट्रॉनिक-वारफेयर अपग्रेड के लिए अधिक जगह और पावर-ग्रोथ मार्जिन मिलता है।
यही कारण है कि एमके2 को भारतीय फाइटर बेड़े में एक महत्वपूर्ण मीडियम-वेट प्लेटफॉर्म के रूप में देखा जा रहा है।

एफ414 से उड़ान, लेकिन नजर स्वदेशी इंजन पर
तेजस एमके2 की शुरुआती डेवलपमेंट और प्रोडक्शन कॉन्फ़िगरेशन के लिए जीई एफ414 का उपयोग किया जाना है। भारत और जीई ने इसके भारतीय उत्पादन और तकनीक हस्तांतरण के लिए भी समझौते की दिशा में कदम बढ़ाए हैं। सरकार ने पहले भी स्पष्ट किया है कि एमके2 के लिए एफ414 का उपयोग किया जाएगा।
लेकिन भारत की दीर्घकालिक रणनीतिक आवश्यकता इससे आगे जाती है।
वह आवश्यकता है, अपना फाइटर इंजन।
यहीं पर कावेरी 2.0 महत्वपूर्ण हो जाता है।

कावेरी 2.0: पुराने कार्यक्रम से नई शुरुआत
कावेरी इंजन प्रोग्राम की मूल परिकल्पना तेजस को स्वदेशी प्रणोदन देने की थी। लेकिन मूल कावेरी इंजन आवश्यक थ्रस्ट हासिल नहीं कर सका। रक्षा मंत्रालय ने 2012 में स्पष्ट किया था कि तेजस को लगभग 90 किलोन्यूटन थ्रस्ट श्रेणी के इंजन की आवश्यकता है, जबकि उस समय का कावेरी उस ऑपरेशनल जरूरत को पूरी तरह पूरा नहीं करता था।
2021 में सरकार ने भी संसद में बताया था कि मौजूदा कावेरी संरचना को तेजस में समाहित नहीं किया जा सकता और एलसीए में उपयोग के लिए संशोधित इंजन संस्करण की जरूरत होगी। साथ ही, कावेरी प्रोग्राम से विकसित तकनीकों को भविष्य के एलसीए वेरिएंट्स और एएमसीए जैसे विमानों के स्वदेशी इंजनों में इस्तेमाल करने की बात कही गई थी।
अब कावेरी प्रोग्राम को नई दिशा देने की कोशिश हो रही है।
हाल की रिपोर्टों के अनुसार कावेरी 2.0 के लिए एक नया इंजन कोर विकसित करने की योजना पर काम हो रहा है, जिसमें लगभग 55-60 किलोन्यूटन ड्राई थ्रस्ट और 90-100 किलोन्यूटन आफ्टरबर्निंग थ्रस्ट श्रेणी तक पहुंचने का लक्ष्य बताया गया है।
यहां यह स्पष्ट करना जरूरी है कि 90-100 किलोन्यूटन अभी डेवलपमेंट लक्ष्य है, प्रमाणित ऑपरेशनल परफॉर्मेंस नहीं।

90 किलोन्यूटन का आंकड़ा क्यों महत्वपूर्ण है?
फाइटर इंजन में थ्रस्ट सबसे दिखाई देने वाला आंकड़ा होता है, लेकिन वही पूरी कहानी नहीं है।
कावेरी 2.0 को सफल होने के लिए केवल 90 किलोन्यूटन थ्रस्ट हासिल करना पर्याप्त नहीं होगा।
उसे साबित करना होगा:
- हाई-एल्टीट्यूड परफॉर्मेंस
- आफ्टरबर्नर रिलायबिलिटी
- ईंधन दक्षता
- कंप्रेसर स्थिरता
- थर्मल प्रबंधन
- टर्बाइन ड्यूरेबिलिटी
- इंजन लाइफ
- मेंटेनेंस साइकिल
- फ्लाइट सुरक्षा
- सर्टिफिकेशन आवश्यकताएं
इसलिए लैबोरेटरी में 90 किलोन्यूटन हासिल करना और फाइटर में वर्षों तक विश्वसनीय रूप से 90 किलोन्यूटन उपलब्ध कराना दो अलग-अलग उपलब्धियां हैं।
यही वह चुनौती है जिसे भारत को इस बार पार करना होगा।
तेजस एमके1ए में कावेरी 2.0 की संभावित भूमिका
कावेरी 2.0 को लेकर सबसे दिलचस्प संभावनाओं में से एक तेजस एमके1ए का भविष्य में मिड-लाइफ अपग्रेड है।
यदि भविष्य में स्वदेशी इंजन 90 किलोन्यूटन श्रेणी के थ्रस्ट, रिलायबिलिटी और आकार के मामले में उपयुक्त साबित होता है, तो एमके1ए के एफ404 इंजन के संभावित प्रतिस्थापन के रूप में इसका अध्ययन किया जा सकता है।
लेकिन इसे ड्रॉप-इन रिप्लेसमेंट मानना गलत होगा।
नया इंजन लगाने के लिए विमान के इंजन माउंट, इनटेक, एग्जॉस्ट, फ्यूल सिस्टम, कूलिंग, इलेक्ट्रिकल जनरेशन, गुरुत्व केंद्र, फ्लाइट-कंट्रोल सॉफ्टवेयर और सर्टिफिकेशन सहित कई प्रणालियों को दोबारा सत्यापित करना होगा।
इसलिए कावेरी 2.0 का एमके1ए में इस्तेमाल एक संभावित भविष्य का रास्ता है, तत्काल ऑपरेशनल योजना नहीं।
एमके2 के लिए कावेरी 2.0 क्यों ज्यादा महत्वपूर्ण हो सकता है?
तेजस एमके2 का बड़ा एयरफ्रेम भविष्य में प्रणोदन अपग्रेड के लिए अधिक लचीलापन प्रदान कर सकता है।
आज:
तेजस एमके2 → जीई एफ414
भविष्य में, यदि स्वदेशी इंजन परिपक्व होता है:
तेजस एमके2 → संभावित स्वदेशी हाई-थ्रस्ट पावरप्लांट
यह बदलाव केवल विदेशी इंजन खरीदने की जरूरत कम नहीं करेगा, बल्कि भारत को फाइटर डिजाइन और अपग्रेड साइकिल पर अधिक नियंत्रण देगा।
यानी इंजन तकनीक में आत्मनिर्भरता का अर्थ केवल आयात प्रतिस्थापन नहीं है।
इसका अर्थ है:
डिजाइन आजादी + आपूर्ति सुरक्षा + तकनीकी स्वामित्व + अपग्रेड स्वायत्तता।
एयर चीफ की दूसरी चेतावनी: तकनीक से ज्यादा जरूरी है समय
यहीं पर एयर चीफ मार्शल ए.पी. सिंह की मई 2026 की टिप्पणी इस पूरी कहानी का दूसरा पक्ष सामने लाती है।
उन्होंने फ्लाइट-टेस्ट अधिकारियों से कहा कि स्वदेशी रक्षा प्रणालियों में डिजाइन-टू-डिलीवरी टाइम साइकिल को बेहतर किया जाना चाहिए, लेकिन सुरक्षा और गुणवत्ता से समझौता किए बिना। साथ ही उन्होंने यह सुनिश्चित करने की आवश्यकता बताई कि प्रणालियां सशस्त्र बलों की ऑपरेशनल जरूरतों को पूरा करें।
यह टिप्पणी सीधे तौर पर भारत के फाइटर प्रोग्राम्स के लिए महत्वपूर्ण है।
क्योंकि किसी विमान की सफलता केवल इस बात से तय नहीं होगी कि वह कितना उन्नत है।
सवाल यह भी है:
वह कब उपलब्ध होगा?
कितनी संख्या में उपलब्ध होगा?
क्या उसके सभी सेंसर और हथियार ऑपरेशनल होंगे?
क्या उसकी रिलायबिलिटी आवश्यक स्तर तक पहुंची होगी?
और क्या वह उस समय उपलब्ध होगा जब वायुसेना को उसकी सबसे अधिक आवश्यकता होगी?
तेजस एमके1ए की देरी ने बढ़ाई चिंता
तेजस एमके1ए की डिलीवरी मूल शेड्यूल से काफी पीछे चल रही है। मई 2026 तक प्रोग्राम में दो साल से अधिक की देरी का उल्लेख किया गया था और डिलीवरी की समयसीमा कई बार संशोधित हुई थी। एचएएल ने बाद में अगस्त-सितंबर 2026 के आसपास डिलीवरी शुरू करने की उम्मीद जताई।
इस देरी के पीछे जीई एफ404 इंजनों की आपूर्ति भी एक प्रमुख कारक रही है। मई की रिपोर्ट के अनुसार उस समय एचएएल के पास केवल छह एफ404 इंजन उपलब्ध थे। इसके अलावा एमके1ए के एईएसए (AESA) रडार, इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर सूट, मिशन सिस्टम और हथियार एकीकरण से जुड़ा ऑपरेशनल सत्यापन भी महत्वपूर्ण था।
यही कारण है कि एयर चीफ की “डिजाइन-टू-डिलीवरी” वाली टिप्पणी को केवल सामान्य प्रशासनिक सलाह के रूप में नहीं देखा जा सकता।
यह भारत के पूरे स्वदेशी फाइटर परिवेश के लिए एक स्पष्ट ऑपरेशनल संदेश है।
एक तरफ फाइटर की कमी, दूसरी तरफ भविष्य के फाइटर प्रोग्राम
भारतीय वायुसेना लंबे समय से फाइटर स्क्वाड्रन की कमी से जूझ रही है। ऐसे में तेजस एमके1ए केवल एक स्वदेशी विमान प्रोग्राम नहीं है—यह तत्काल फोर्स स्ट्रक्चर को मजबूत करने की आवश्यकता से भी जुड़ा है।
इसलिए एमके1ए की डिलीवरी में देरी और एमके2 तथा एएमसीए जैसे भविष्य के प्रोग्राम्स के डेवलपमेंट टाइमलाइन को अलग-अलग नहीं देखा जा सकता।
वायुसेना को आज के लिए विमान चाहिए।
देश को अगले 20-30 वर्षों के लिए स्वदेशी तकनीक भी चाहिए।
दोनों जरूरतें एक साथ पूरी करनी होंगी।
भविष्य का फाइटर अकेला फाइटर नहीं होगा
एक कॉन्सेप्चुअल ग्राफिक में एक फाइटर को “नियंत्रक मदरशिप” के रूप में दिखाया गया है, जिसके साथ मानवरहित विंगमैन, स्वार्म ड्रोन, क्रूज मिसाइल और ग्लाइड बम जैसी संपत्तियां जुड़ी हैं।
इसे तेजस एमके2 का घोषित ऑपरेशनल कॉन्फ़िगरेशन नहीं माना जाना चाहिए।
लेकिन यह भविष्य की एयर-कॉम्बैट संरचना की एक महत्वपूर्ण दिशा जरूर बताता है।
आने वाले समय में एक उन्नत फाइटर केवल खुद हथियार ले जाकर लक्ष्य पर हमला करने वाला प्लेटफॉर्म नहीं रहेगा।
वह बन सकता है:
सेंसर → डेटा फ्यूजन नोड → मिशन कमांडर → हथियार समन्वयक
यानी मानवयुक्त फाइटर कई मानवरहित प्रणालियों को समन्वित कर सकता है।
इस संरचना में विमान को अधिक सेंसर, अधिक कंप्यूटिंग पावर, बेहतर डेटा लिंक, इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर क्षमता और पर्याप्त इलेक्ट्रिकल तथा थर्मल क्षमता की आवश्यकता होगी।
तेजस एमके2 का बड़ा एयरफ्रेम इसी प्रकार के भविष्य के विस्तार के लिए एमके1ए की तुलना में अधिक जगह प्रदान करता है।
कावेरी 2.0 का महत्व तेजस से भी आगे
भारत के लिए कावेरी 2.0 का सबसे बड़ा रणनीतिक महत्व यह होगा कि इससे एक स्वदेशी एयरो-इंजन तकनीकी परिवेश विकसित हो सकता है।
डीआरडीओ के मौजूदा प्रोग्राम्स में कावेरी से व्युत्पन्न तकनीकों, छोटे टर्बोफैन इंजनों और मानवरहित प्रणालियों के लिए प्रणोदन तकनीकों पर भी काम किया जा रहा है। फरवरी 2026 में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने जीटीआरई का दौरा कर स्वदेशी सैन्य गैस-टर्बाइन इंजन डेवलपमेंट प्रोग्राम्स की समीक्षा की और कावेरी इंजन का फुल-आफ्टरबर्नर परीक्षण भी देखा। सरकार ने इस अवसर पर स्वदेशी एयरो-इंजन डेवलपमेंट को राष्ट्रीय सुरक्षा और आत्मनिर्भरता से जोड़ा।
यदि भारत 90-100 किलोन्यूटन श्रेणी के स्वदेशी इंजन को ऑपरेशनल परिपक्वता तक ले जाता है, तो उससे आगे अधिक थ्रस्ट वाले इंजन विकसित करने के लिए तकनीकी आधार मजबूत हो सकता है।
और यही आधार भविष्य के एएमसीए जैसे प्रोग्राम्स के लिए निर्णायक हो सकता है।
असली लक्ष्य 90 किलोन्यूटन नहीं, इंजन इकोसिस्टम होना चाहिए
भारत को कावेरी 2.0 की सफलता को केवल इस सवाल से नहीं आंकना चाहिए कि उसने 90 किलोन्यूटन हासिल किया या नहीं।
बड़ा लक्ष्य होना चाहिए:
क्या भारत एक ऐसा स्वदेशी एयरो-इंजन परिवेश बना सकता है जो अलग-अलग विमान श्रेणियों के लिए स्केलेबल इंजन विकसित कर सके?
मानवरहित विमान (यूएवी/यूसीएवी) के लिए छोटे इंजनों से लेकर 90-100 किलोन्यूटन श्रेणी के फाइटर इंजन और आगे 110-120 किलोन्यूटन या उससे अधिक थ्रस्ट वाले अगली पीढ़ी के इंजनों तक।
यही क्षमता भारत को भविष्य में फाइटर विमान डेवलपमेंट में वास्तविक रणनीतिक स्वायत्तता देगी।
निष्कर्ष: तेजस एमके2 की परीक्षा केवल हवा में नहीं होगी
तेजस एमके2 भारत के लिए एक महत्वपूर्ण तकनीकी सेतु है।
एक तरफ यह एमके1ए से अधिक हथियार, अधिक रेंज और एंड्योरेंस तथा अधिक विकास क्षमता वाला फाइटर बनने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। दूसरी तरफ कावेरी 2.0 भारत के सामने उस सबसे कठिन तकनीकी चुनौती को फिर से रखता है जिसने देश के फाइटर प्रोग्राम को दशकों तक विदेशी प्रणोदन पर निर्भर रखा, हाई-परफॉर्मेंस स्वदेशी टर्बोफैन इंजन।
लेकिन एयर चीफ मार्शल ए.पी. सिंह की टिप्पणियां इस पूरी कहानी का सबसे महत्वपूर्ण ऑपरेशनल रिमाइंडर देती हैं।
भारत को अब केवल यह साबित नहीं करना है कि वह फाइटर बना सकता है।
उसे यह भी साबित करना है कि:
वह फाइटर समय पर बना सकता है।
वह उसे आवश्यक संख्या में बना सकता है।
उसमें सभी जरूरी हथियार और सेंसर समय पर एकीकृत कर सकता है।
और वह विमान वास्तविक ऑपरेशनल जरूरतों को उसी समय पूरा कर सकता है जब वायुसेना को उसकी जरूरत हो।
यही कारण है कि तेजस एमके2 और कावेरी 2.0 को केवल दो अलग-अलग रक्षा प्रोजेक्ट्स के रूप में देखना उचित नहीं होगा।
ये भारत के लिए एक बड़ी यात्रा के दो पड़ाव हैं-
तेजस एमके1ए से तेजस एमके2, एफ404 से एफ414, और एफ414 से संभावित स्वदेशी हाई-थ्रस्ट इंजन तक।
यदि इस पूरी श्रृंखला में तकनीक, परीक्षण, सर्टिफिकेशन, उत्पादन और डिलीवरी—इन पांचों मोर्चों पर भारत समयबद्ध तरीके से सफलता हासिल करता है, तो इसका परिणाम केवल एक नया फाइटर विमान नहीं होगा।
यह भारत को उस चुनिंदा वैश्विक समूह के करीब ले जाएगा जो अपने लड़ाकू विमान के साथ उसका हाई-परफॉर्मेंस इंजन भी विकसित करने की क्षमता रखते हैं।
और आधुनिक वायु युद्ध के युग में यही वास्तविक रणनीतिक आत्मनिर्भता है।
