साल 1999, जगह करगिल…
बर्फ से ढकी पहाड़ियों पर लगातार गोली-बारी की आवाजें आ रही थीं। दिन हो या रात ये आवाजें लगातार आती रहती थीं। पर कभी-कभी ऐसा सन्नाटा छा जाता कि अपनी ही दिल की धड़कन सुनाई देने लगती थी। इसी खामोशी और धमाके की लुका-छिपी के बीच बर्फीली हवाओं को चीरते हुए 27 मई की सुबह सर्च एंड रेस्क्यू मिशन पर निकले मिग-21 को दुश्मन की चालाकियों का पता नहीं चला।
मिग-21 का मिशन था- नीचे बर्फ से ढकी पहाड़ियों पर बंकरों में छिपे उन घुसपैठियों का पता लगाना, जिन्होंने सर्दियों में खाली हुई भारतीय चौकियों पर कब्जा जमा लिया था। दुश्मन चालाक था और बेहद शातिर भी। ऊंची चोटियों में छिपे पाकिस्तानी सैनिकों के कंधे पर टिकी एक छोटी-सी मिसाइल थी, जिसे सेना की तकनीकी भाषा में मैनपैड लॉन्चर भी कहा जाता है, उसका नाम था स्ट्रिंगर, जिसके एक हमले ने भारतीय वायुसेना को करगिल के युद्ध में पहला घाव दे दिया था।
नेटफ्लिक्स की सीरीज ‘ऑपरेशन सफेद सागर’ ने 1999 के करगिल युद्ध में भारतीय वायुसेना के उन अभियानों को फिर चर्चा में ला दिया है, जिनमें आसमान से लड़ने वाले भारतीय पायलटों को जमीन से भी एक बेहद घातक खतरे का सामना करना पड़ा था, मैन-पोर्टेबल एयर डिफेंस सिस्टम यानी मैनपैड्स (MANPADS)। करगिल की ऊंची चोटियों पर बैठे पाकिस्तानी सैनिकों के पास ऐसी शोल्डर-फायर्ड मिसाइलें थीं, जो कम ऊंचाई पर उड़ रहे लड़ाकू विमान और हेलीकॉप्टर को कुछ ही सेकंड में निशाना बना सकती थीं। इसी खतरे के बीच स्क्वाड्रन लीडर अजय आहूजा अपने साथी पायलट फ्लाइट लेफ्टिनेंट के. नचिकेता को तलाशने के लिए क्षेत्र में बने रहे और उनका मिग-21 एक शोल्डर-फायर्ड सतह-से-हवा मिसाइल की चपेट में आ गया। भारतीय और कई स्वतंत्र स्रोत इसे अमेरिकी एफआईएम-92 स्टिंगर (FIM-92 Stinger) बताते हैं।

एक जरूरी तथ्यात्मक स्पष्टता: स्क्वाड्रन लीडर आहूजा के मिग-21 को स्टिंगर से हिट होना भारतीय और कई स्वतंत्र स्रोतों का आकलन है, जबकि उस समय की आधिकारिक वीरता-प्रशस्ति में मिसाइल का नाम नहीं, केवल शोल्डर-फायर्ड सैम (SAM) का उल्लेख है। करगिल में पाकिस्तान के पास स्टिंगर के साथ-साथ अंज़ा-II मिसाइलें भी थीं, इसलिए हर पाकिस्तानी मैनपैड्स हमले को स्टिंगर मान लेना सही नहीं होगा लेकिन ऐसा भी नहीं था कि पाकिस्तान के पास अमेरिका में बनी स्टिंगर मिसाइल्स नहीं थी।
27 मई 1999 को आहूजा ने अपने मिग-21 से नचिकेता के क्रैश साइट का पता लगाने के लिए इलाके में चक्कर लगाए। भारतीय वायुसेना के गैलेंट्री रिकॉर्ड के अनुसार उन्हें क्षेत्र में सतह-से-हवा मिसाइलों के खतरे की जानकारी थी, फिर भी उन्होंने खोज जारी रखी। उनका विमान हिट हुआ और उन्होंने सुरक्षित इजेक्शन किया, लेकिन जमीन पर उतरने के बाद उनकी मृत्यु हो गई। अगले दिन एक एमआई-17 हेलीकॉप्टर भी शोल्डर-फायर्ड स्टिंगर मिसाइल की चपेट में आया और उसके चारों क्रू मेंबर्स मारे गए। इन घटनाओं ने ऑपरेशन सफेद सागर की रणनीति बदल दी, भारतीय विमानों को अधिक ऊंचाई से हमला करना पड़ा और हेलीकॉप्टरों की आक्रामक भूमिका को लगभग रोक दिया गया।
क्या है स्टिंगर मिसाइल?
एफआईएम-92 स्टिंगर अमेरिका की विकसित की हुई मैन-पोर्टेबल, शोल्डर-फायर्ड, शॉर्ट-रेंज सतह-से-हवा मिसाइल है। इसे मूल रूप से ह्यूजेस और जनरल डायनेमिक्स ने विकसित किया था और अमेरिकी सेना ने इसे 1981 में सेवा में शामिल करना शुरू किया। आज इसका उत्पादन और विकास रेथियॉन/आरटीएक्स से जुड़ा है। यह एक फायर-एंड-फॉरगेट मिसाइल है, यानी लक्ष्य पर सीकर लॉक होने के बाद मिसाइल को लगातार ऑपरेटर द्वारा गाइड करने की जरूरत नहीं होती।
स्टिंगर का मूल उद्देश्य कम ऊंचाई पर उड़ने वाले लड़ाकू विमान, हेलीकॉप्टर, क्रूज मिसाइल और अब मानवरहित विमान/ड्रोन जैसे लक्ष्यों को रोकना है। इसकी खासियत यह है कि इसे केवल कंधे से नहीं, बल्कि वाहन और अन्य प्लेटफॉर्म से भी दागा जा सकता है।
पाकिस्तान के पास स्टिंगर कब आया?
यहां एक दिलचस्प ऐतिहासिक तथ्य है। पाकिस्तान ने स्टिंगर को 1999 में पहली बार हासिल नहीं किया था। 1980 के दशक में अफगानिस्तान के सोवियत युद्ध के दौरान अमेरिका ने स्टिंगर मिसाइलों को पाकिस्तान के रास्ते अफगान मुजाहिदीन तक पहुंचाया था। 1986 में स्टिंगर की सप्लाई शुरू होने के बाद पाकिस्तान इस पूरे गुप्त सप्लाई नेटवर्क का प्रमुख माध्यम था।
यानी 1999 तक स्टिंगर पाकिस्तान-अफगान क्षेत्र में कोई नया हथियार नहीं था। हालांकि करगिल में इस्तेमाल हुए हर मिसाइल की सटीक प्रोक्योरमेंट चेन और वेरिएंट सार्वजनिक रिकॉर्ड से पूरी तरह स्पष्ट नहीं है। करगिल के दौरान पाकिस्तान के पास अमेरिकी मूल के स्टिंगर और चीनी मूल/चीनी-व्युत्पन्न अंज़ा फैमिली, दोनों प्रकार की शोल्डर-फायर्ड एयर-डिफेंस प्रणालियां मौजूद थीं।
स्टिंगर मिसाइल की खासियत
स्टिंगर की सबसे बड़ी ताकत उसकी सरलता और स्वायत्तता (ऑटोनॉमी) है।
इसमें पैसिव इन्फ्रारेड/अल्ट्रावायलेट सीकर होता है। यानी मिसाइल लक्ष्य से निकलने वाली इन्फ्रारेड ऊर्जा को डिटेक्ट करती है और लक्ष्य की ओर बढ़ती है। आधुनिक स्टिंगर वेरिएंट्स में सीकर और सिग्नल प्रोसेसिंग को लगातार बेहतर किया गया ताकि फ्लेयर और बैकग्राउंड हीट जैसे काउंटरमेजर्स के बावजूद लक्ष्य को पहचानने की क्षमता बढ़े।
इसके प्रमुख गुण हैं:
- फायर-एंड-फॉरगेट ऑपरेशन
- पैसिव आईआर/यूवी होमिंग
- कम ऊंचाई पर उड़ रहे विमान और हेलीकॉप्टर के विरुद्ध उपयोग
- तेज प्रतिक्रिया और अपेक्षाकृत कॉम्पैक्ट लॉन्चर
- कंधे से दागे जाने के अलावा वाहन-माउंटेड कॉन्फ़िगरेशन भी
- आधुनिक वर्जन में बेहतर काउंटरमेजर रिजेक्शन
- ड्रोन खतरे के लिए बाद के वर्जन में प्रॉक्सिमिटी फ्यूज जोड़ा गया
स्टिंगर लगभग मैक 2 तक की गति हासिल कर सकती है। इसकी प्रभावी रेंज वेरिएंट और एंगेजमेंट परिस्थितियों पर निर्भर करती है; अमेरिकी सेना के दस्तावेजों में वर्तमान ऑपरेशनल स्टिंगर के लिए लगभग 5 किलोमीटर श्रेणी की प्रभावी रेंज का आंकड़ा मिलता है।
इसे आम तौर पर दो-सदस्यीय टीम ऑपरेट करती है, हालांकि आधुनिक दस्तावेजों के अनुसार इसे एक व्यक्ति भी ऑपरेट कर सकता है। मिसाइल सील्ड राउंड के रूप में आती है और लॉन्चर को लंबे फील्ड मेंटेनेंस की आवश्यकता नहीं होती।

स्टिंगर के कौन-कौन से वेरिएंट हैं?
स्टिंगर को चार दशक से ज्यादा समय में लगातार अपग्रेड किया गया है।
एफआईएम-92ए – बेसिक स्टिंगर: मूल वर्जन, सिंगल-चैनल आईआर सीकर के साथ।
एफआईएम-92बी – स्टिंगर पोस्ट: इसमें आईआर के साथ यूवी सेंसिंग जोड़ी गई, जिससे झूठे लक्ष्यों और फ्लेयर के विरुद्ध पहचान बेहतर हुई।
एफआईएम-92सी – स्टिंगर आरएमपी: रीप्रोग्रामेबल माइक्रोप्रोसेसर ने मिसाइल को सॉफ्टवेयर अपग्रेड के जरिए भविष्य के खतरों के अनुरूप बदलने की सुविधा दी।
इसके बाद डी/जी/एच जैसे अपग्रेड और एफआईएम-92ई – आरएमपी ब्लॉक I आए, जिनमें गाइडेंस इलेक्ट्रॉनिक्स, नियंत्रण और काउंटरमेजर रेजिस्टेंस को सुधारा गया।
सबसे महत्वपूर्ण आधुनिक अपग्रेड है एफआईएम-92जे। इसमें पुराने कंपोनेंट्स को बदलकर सर्विस लाइफ बढ़ाई गई और प्रॉक्सिमिटी फ्यूज जोड़ा गया, जिससे छोटे ड्रोन के खिलाफ मिसाइल की प्रभावशीलता बढ़ी।
एफआईएम-92के वाहन-माउंटेड/नेटवर्क्ड इस्तेमाल के लिए विकसित कॉन्फ़िगरेशन है।
एक महत्वपूर्ण बात यह भी है कि प्रस्तावित स्टिंगर ब्लॉक II में इमेजिंग-इन्फ्रारेड सीकर और अधिक रेंज जैसे बड़े अपग्रेड की योजना थी, लेकिन वह कार्यक्रम आगे नहीं बढ़ सका।
स्टिंगर की खामियां क्या हैं?
इतने सफल हथियार प्रणाली के बावजूद स्टिंगर परफेक्ट नहीं है।
पहली समस्या है रेंज। इसकी प्रणोदन संरचना (प्रोपल्शन आर्किटेक्चर) दशकों पुरानी है और अमेरिकी सेना स्वयं मानती है कि इसकी प्रभावी रेंज में वर्षों से बहुत बड़ा बदलाव नहीं हुआ है। 2025 में अमेरिकी सेना ने इसी सीमा को दूर करने के लिए रेड वास्प नामक एडवांस्ड-प्रोपल्शन रिसर्च प्रोग्राम शुरू किया।
दूसरी समस्या पुरानी होती इन्वेंट्री रही है। स्टिंगर का नया उत्पादन लंबे समय तक सीमित रहा और अमेरिका को पुरानी मिसाइलों को सर्विस लाइफ एक्सटेंशन प्रोग्राम के जरिए रिफर्बिश करना पड़ा। 2024 में अमेरिकी सेना ने लगभग 1,900 पहले से अनसर्विसेबल स्टिंगरों को रिफर्बिश करके इन्वेंट्री में वापस लाने की जानकारी दी।
तीसरी बात यह कि यह मूलतः कम ऊंचाई की प्वाइंट डिफेंस मिसाइल है। बहुत ऊंचाई पर उड़ रहे विमान के विरुद्ध इसका दायरा सीमित है। यही बात करगिल में भारतीय वायुसेना की टैक्टिकल प्रतिक्रिया का आधार बनी।
करगिल में पाकिस्तान ने कैसे किया स्टिंगर का प्रयोग?
करगिल की भौगोलिक परिस्थितियां स्टिंगर जैसे मैनपैड्स के लिए बेहद अनुकूल थीं। पाकिस्तानी सैनिक और घुसपैठिए ऊंची चोटियों पर छिपे हुए थे, जबकि भारतीय विमानों को नीचे की घाटियों और पहाड़ी कगारों के आसपास हमले की रूपरेखा बनानी पड़ रही थी।
27 मई 1999 को स्क्वाड्रन लीडर अजय आहूजा का मिग-21 एक शोल्डर-फायर्ड सैम की चपेट में आया। भारतीय और कई स्वतंत्र सूत्र इसे स्टिंगर बताते हैं। आहूजा उस समय नचिकेता के क्रैश हुए विमान और पायलट की तलाश कर रहे थे।
इसके अगले दिन, 28 मई को एक सशस्त्र एमआई-17 हेलीकॉप्टर को भी स्टिंगर मिसाइल ने निशाना बनाया। यह हेलीकॉप्टर चार विमानों की फॉर्मेशन में था और उसमें पर्याप्त सेल्फ-प्रोटेक्शन फ्लेयर क्षमता नहीं थी। इस हमले में चारों क्रू मेंबर्स मारे गए।
यह केवल दो विमानों की क्षति नहीं थी। इसने पूरे एयर कैंपेन की रणनीति बदल दी। भारतीय वायुसेना को समझ आ गया कि यदि विमान मैनपैड्स के घातक दायरे में नीचे आए तो पहाड़ों पर छिपी छोटी मिसाइल टीमों को पहचानना बेहद कठिन होगा।
करगिल के दौरान भारतीय सेना ने बाद में पाकिस्तानी ठिकानों से अमेरिकी मूल के स्टिंगर लॉन्चर/मिसाइलें भी बरामद कीं, जिससे इस हथियार की मौजूदगी का ठोस प्रमाण मिला।
स्टिंगर से कैसे बच पाए बाकी भारतीय मिग-21?
करगिल में स्टिंगर का सबसे बड़ा ऑपरेशनल असर यही था कि भारतीय वायुसेना ने अपनी रणनीति बदल दी।
सबसे पहले विमानों को अधिक ऊंचाई से उड़ान भरने का निर्देश दिया गया, ताकि वे मैनपैड्स के एंगेजमेंट दायरे से बाहर रहें। इससे एक नई समस्या पैदा हुई, ऊंचाई बढ़ने पर बिना गाइडेड बमों की सटीकता घटने लगी।
इसके साथ भारतीय विमानों में फ्लेयर और अन्य सेल्फ-प्रोटेक्शन उपाय को तेजी से बढ़ाया गया। भारतीय वायुसेना के बाद के विवरण बताते हैं कि मिशन में शामिल फाइटर विमानों को इन्फ्रारेड-गाइडेड मिसाइलों के खिलाफ एक्टिव काउंटरमेजर्स दिए गए।
हेलीकॉप्टरों के लिए स्थिति और कठिन थी। एमआई-17 को आक्रामक फायर-सपोर्ट भूमिका से लगभग हटा दिया गया, क्योंकि धीमी गति से उड़ने वाले हेलीकॉप्टर के लिए मैनपैड्स का खतरा बहुत गंभीर था।
सबसे बड़ा टैक्टिकल ब्रेकथ्रू मिराज-2000 के आने से हुआ। मिराज को अधिक ऊंचाई से प्रिसिजन-गाइडेड हथियार इस्तेमाल करने के लिए तैनात किया गया। लाइटनिंग टारगेटिंग पॉड और लेजर-गाइडेड बमों के एकीकरण ने भारतीय वायुसेना को मैनपैड्स के दायरे में नीचे आए बिना अत्यंत सटीक हमले करने की क्षमता दी।
यही वह बदलाव था जिसने टाइगर हिल, मुंथो ढालो और अन्य महत्वपूर्ण लक्ष्यों पर सटीक हमलों को संभव बनाया।
भारत के पास स्टिंगर जैसी कौन सी मिसाइल है?
आज भारत के पास मैनपैड्स/वीशोरैड (VSHORAD) क्षेत्र में एक से ज्यादा विकल्प हैं।
1. इग्ला-1एम, भारत की पुरानी मैनपैड्स
हां, भारतीय सेना इग्ला फैमिली का इस्तेमाल करती रही है।
भारत की थल सेना और वायुसेना के पास इग्ला-1एम प्रणालियां 1989 से मौजूद रही हैं। यह वही व्यापक श्रेणी है जिसे आम भाषा में स्टिंगर जैसी शोल्डर-फायर्ड एयर-डिफेंस मिसाइल कहा जा सकता है। इसका उपयोग कम ऊंचाई पर उड़ रहे विमान और हेलीकॉप्टर जैसे लक्ष्यों के खिलाफ किया जाता है।
लेकिन यह आज की पीढ़ी के हिसाब से पुरानी प्रणाली है। इसलिए भारत इसे आधुनिक वीशोरैड प्रणालियों से बदलने/मजबूत करने की दिशा में बढ़ रहा है।

2. इग्ला-एस, भारत की मौजूदा आधुनिक आयातित मैनपैड्स
इग्ला-एस (9K338) इग्ला फैमिली का काफी उन्नत वर्जन है।
इसकी प्रभावी इंटरसेप्शन रेंज लगभग 6 किलोमीटर श्रेणी है और लक्ष्य की ऊंचाई लगभग 3.5 किलोमीटर तक बताई जाती है। इसका बड़ा फायदा अपग्रेडेड वारहेड, प्रॉक्सिमिटी फ्यूज और बेहतर इन्फ्रारेड सीकर है।
भारत ने पहले इमरजेंसी प्रोक्योरमेंट के तहत इग्ला-एस हासिल किया। 2020-21 में थल सेना को 24 लॉन्चर और 216 मिसाइलें मिलीं। इसके बाद एक और ऑर्डर में 48 लॉन्चर, 100 मिसाइलें, नाइट साइट्स और टेस्टिंग उपकरण शामिल थे। इस बाद के बैच की असेंबली भारत में अडाणी डिफेंस द्वारा तकनीक हस्तांतरण व्यवस्था के तहत की गई।
यानी आज भारत में इग्ला-एस सिर्फ आयातित हथियार नहीं है; इसके भारतीय असेंबली/औद्योगीकरण का रास्ता भी बनाया गया है।
3. वीशोरैड्स (VSHORADS), भारत का स्वदेशी अगला कदम
भारत का सबसे महत्वपूर्ण स्वदेशी जवाब है डीआरडीओ वीशोरैड्स, वेरी शॉर्ट रेंज एयर डिफेंस सिस्टम।
डीआरडीओ इसे चौथी पीढ़ी की मिसाइल प्रणाली बताता है। इसमें अनकूल्ड इमेजिंग इन्फ्रारेड (IIR) सीकर, ड्यूअल-थ्रस्ट सॉलिड रॉकेट मोटर और लघु आकार का रिएक्शन कंट्रोल सिस्टम जैसी तकनीकें हैं।
इसके प्रकाशित विवरण में शामिल हैं:
- रेंज: लगभग 0.5–6 किलोमीटर
- मिसाइल वजन: लगभग 21.5 किलोग्राम
- आईआईआर (IIR) सीकर
- ड्यूअल-थ्रस्ट सॉलिड मोटर
- ब्लास्ट-फ्रैगमेंटेशन वारहेड
- मैन-पोर्टेबल ट्राइपॉड लॉन्चर
फरवरी 2026 में डीआरडीओ ने फाइनल डिप्लॉयमेंट कॉन्फ़िगरेशन में लगातार तीन सफल फ्लाइट ट्रायल किए, जिनमें हाई-स्पीड एरियल टारगेट को अलग-अलग गति, रेंज और ऊंचाई की स्थितियों में इंटरसेप्ट किया गया।
भारत सरकार ने जुलाई 2026 में थल सेना के लिए वीशोरैड्स की खरीद को भी रक्षा अधिग्रहण परिषद (DAC) की मंजूरी दी।

4. स्टारस्ट्रीक, भारत के लिए एक अलग दृष्टिकोण
भारत अब स्टारस्ट्रीक भी हासिल कर रहा है। यह स्टिंगर और इग्ला की तरह इन्फ्रारेड-होमिंग मिसाइल नहीं है; इसका गाइडेंस सिद्धांत लेजर बीम राइडिंग है।
थेल्स और भारत डायनेमिक्स लिमिटेड ने भारत के लिए स्टारस्ट्रीक मैनपैड्स की शुरुआती सप्लाई पर समझौता किया है और इसके लगभग 60 प्रतिशत तक स्वदेशी विनिर्माण का लक्ष्य रखा गया है।
स्टारस्ट्रीक की सबसे बड़ी खासियत इसकी मैक 3 से ज्यादा गति और तीन स्वतंत्र रूप से गाइडेड काइनेटिक डार्ट्स वाला वारहेड है। इसका लेजर बीम-राइडिंग गाइडेंस इन्फ्रारेड फ्लेयर जैसे परंपरागत काउंटरमेजर्स से प्रभावित नहीं होता। इसकी प्रकाशित रेंज लगभग 7 किलोमीटर श्रेणी बताई जाती है।

कौन सी मैनपैड्स सबसे बेहतर है?
यहां एक ही मिसाइल को हर परिस्थिति में “सबसे अच्छी” कहना सही नहीं होगा। सीकर, रेंज, गति, काउंटरमेजर रेजिस्टेंस, वारहेड, मोबिलिटी और कॉम्बैट अनुभव, इन सभी को साथ देखना पड़ता है।
| MANPADS | 🇺🇸 स्टिंगर | 🇷🇺 इग्ला-एस | 🇮🇳 वीशोरैड्स | 🇬🇧/🇮🇳 स्टारस्ट्रीक |
| मूल देश | अमेरिका | रूस | भारत | यूके / भारत में प्रोडक्शन पार्टनरशिप |
| गाइडेंस | आईआर/यूवी | आईआर | इमेजिंग आईआर | लेजर बीम राइडिंग |
| फायर एंड फॉरगेट | हां | हां | हां | नहीं, ऑपरेटर ट्रैकिंग आवश्यक |
| रेंज | ~5 किमी श्रेणी | ~6 किमी | ~6 किमी | ~7 किमी श्रेणी |
| गति | ~मैक 2 | ~मैक 1.9 श्रेणी | ~मैक 1.5 | मैक 3+ |
| वारहेड | एचई (HE) | बड़ा एचई/फ्रैगमेंटेशन | ब्लास्ट-फ्रैगमेंटेशन | 3 काइनेटिक डार्ट्स |
| प्रॉक्सिमिटी फ्यूज | आधुनिक जे/प्रॉक्स में | हां | सिस्टम-विशिष्ट आधुनिक फ्यूज | अलग सिद्धांत |
| आईआर फ्लेयर प्रतिरोध | अच्छा, आधुनिक वेरिएंट में बेहतर | अच्छा | आईआईआर सीकर, एडवांस्ड डिस्क्रिमिनेशन | आईआर फ्लेयर से अप्रभावित |
| कॉम्बैट अनुभव | बहुत अधिक | बहुत अधिक | अभी सीमित/परीक्षण चरण | वैश्विक स्तर पर कॉम्बैट-प्रूवन |
| ड्रोन के विरुद्ध उपयुक्तता | अच्छी, जे/प्रॉक्स से बेहतर | अच्छी | विशेष रूप से आधुनिक एरियल खतरों के लिए डिजाइन | अच्छी |
| सबसे बड़ी ताकत | मैच्योर + कॉम्बैट प्रूवन | बड़ा वारहेड + रेंज | आधुनिक स्वदेशी आर्किटेक्चर | गति + लेजर गाइडेंस |
| बड़ी कमजोरी | पुराना प्रणोदन/रेंज | पुरानी आर्किटेक्चर की विरासत | अभी स्टिंगर जितनी कॉम्बैट-प्रूवन नहीं | निरंतर लाइन-ऑफ-साइट ट्रैकिंग |
तो विजेता कौन?
कॉम्बैट अनुभव की बात करें तो स्टिंगर सबसे मजबूत दावेदार है। अफगानिस्तान से लेकर इराक, सीरिया और यूक्रेन तक इसका ऑपरेशनल रिकॉर्ड बहुत बड़ा है। अमेरिका आज भी एफआईएम-92ई/जे स्टिंगर को इस्तेमाल करता है और 2026 में भी एफआईएम-92ई लाइव-फायर अभ्यास हो रहे हैं।
वारहेड और रेंज की दृष्टि से इग्ला-एस बेहद सक्षम है। इसकी 6-किलोमीटर श्रेणी की रेंज और अपेक्षाकृत बड़ा वारहेड इसे गंभीर एरियल लक्ष्यों के खिलाफ मजबूत विकल्प बनाता है।
लेकिन तकनीक और भविष्य की संभावनाओं की बात करें तो भारतीय वीशोरैड्स सबसे महत्वपूर्ण प्रणाली बनकर उभरता है। इसका आईआईआर सीकर, ड्यूअल-थ्रस्ट मोटर, लघु रिएक्शन-कंट्रोल सिस्टम और स्वदेशी डिजाइन इसे पुरानी पीढ़ी की मैनपैड्स से अलग करते हैं। इसकी कमजोरी फिलहाल यही है कि इसका कॉम्बैट रिकॉर्ड स्टिंगर या इग्ला-एस जैसा दशकों लंबा नहीं है।
और काउंटरमेजर रेजिस्टेंस तथा गति को सबसे ज्यादा महत्व दें तो स्टारस्ट्रीक बेहद अलग और शक्तिशाली अवधारणा है, क्योंकि लेजर बीम राइडिंग के कारण यह परंपरागत आईआर फ्लेयर समस्या से अलग तरीके से मुकाबला करता है और मैक 3+ गति हासिल करता है। लेकिन इसके लिए ऑपरेटर को लक्ष्य पर लेजर गाइडेंस बनाए रखनी होती है, इसलिए इसका ऑपरेटिंग सिद्धांत स्टिंगर/इग्ला/वीशोरैड्स के फायर-एंड-फॉरगेट मॉडल से अलग है।
अंतिम निष्कर्ष
करगिल में स्टिंगर ने भारतीय वायुसेना को एक कठोर सबक दिया था, आसमान पर कब्जा केवल लड़ाकू विमानों से नहीं, बल्कि जमीन पर छिपे छोटे मिसाइल टीमों से भी चुनौती पा सकता है।
1999 में इसका जवाब था, ऊंचाई बढ़ाओ, फ्लेयर लगाओ और मैनपैड्स के दायरे से बाहर रहो।
आज जवाब कहीं ज्यादा व्यापक है, आधुनिक सीकर, बेहतर काउंटरमेजर्स, नेटवर्क्ड एयर डिफेंस, एंटी-ड्रोन क्षमता और स्वदेशी वीशोरैड्स।
यही वजह है कि करगिल का स्टिंगर एपिसोड सिर्फ एक मिसाइल की कहानी नहीं है। यह उस बदलाव की कहानी है जिसमें भारत ने इग्ला-1एम जैसी पुरानी आयातित मैनपैड्स से लेकर इग्ला-एस, स्टारस्ट्रीक और अंततः अपने स्वदेशी वीशोरैड्स तक एक लंबा सफर तय किया है। और अगर आज इन चारों में भविष्य की भारतीय जरूरत के लिए किसी एक पर दांव लगाना हो, तो वीशोरैड्स सबसे महत्वपूर्ण दीर्घकालिक विकल्प दिखाई देता है, जबकि स्टिंगर कॉम्बैट-प्रूवन बेंचमार्क और इग्ला-एस मैच्योर अंतरिम क्षमता बने हुए हैं।
