अक्टूबर-नवंबर 1962 में भारत और चीन के बीच युद्ध समाप्त हो चुका था, और भारतीय सैन्य प्रतिष्ठान को यह एहसास हो चुका था कि चीन से मुकाबला केवल पारंपरिक सेना के भरोसे नहीं किया जा सकता। जरूरत थी ऐसे लड़ाकों की, जो पहाड़ों, बर्फीले इलाकों और दुश्मन के पीछे जाकर अभियान चलाने में सक्षम हों। इसी दौर में तिब्बती लड़ाकों को लेकर एक विशेष बल बनाने की योजना पर काम शुरू हुआ, और इसी हार की राख से एक ऐसी यूनिट का जन्म हुआ जिसका अस्तित्व वर्षों तक आम भारतीयों से लगभग छिपा रहा।
इस पूरी परियोजना में भारतीय खुफिया तंत्र, तिब्बती नेतृत्व और अमेरिकी सीआईए (CIA) के बीच अलग-अलग स्तरों पर सहयोग की भूमिका रही, हालांकि इस विशेष सुरक्षा बल यानी स्पेशल फ्रंटियर फोर्स (Special Frontier Force, SFF) को वास्तव में किसने और किस सीमा तक बनाया, इस पर ऐतिहासिक स्रोतों में अलग-अलग मत मिलते हैं। इस फोर्स के गठन में ब्रिगेडियर सुजान सिंह उबान की निर्णायक भूमिका रही, जो बाद में मेजर जनरल एस.एस. उबान बने और एसएफएफ के पहले कमांडर माने जाते हैं। उबान इससे पहले 22 माउंटेन रेजिमेंट (22 Mountain Regiment) की कमान संभाल चुके थे, और इसी वजह से एसएफएफ के लिए एस्टैब्लिशमेंट 22 (Establishment 22) या संक्षेप में ’22’ नाम जुड़ गया।
एसएफएफ की शुरुआती ताकत का आधार तिब्बती लड़ाके थे, जिनमें बड़ी संख्या में खम्पा समुदाय के लोग शामिल थे। इन लोगों को सामान्य सैनिकों की तरह नहीं, बल्कि विशेष अभियानों, गुरिल्ला युद्ध, टोही और कठिन पर्वतीय अभियानों के लिए प्रशिक्षित किया गया था। जवान तिब्बती थे, लेकिन कमांड संरचना में भारतीय सेना के अधिकारी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते थे, और यही बात एसएफएफ को भारतीय सेना की सामान्य बटालियन से अलग बनाती थी। भारतीय सेना की नियमित यूनिटों के विपरीत एसएफएफ स्वयं आर्मी का हिस्सा नहीं थी, हालांकि उसकी कई इकाइयां समय-समय पर भारतीय सेना के ऑपरेशनल कंट्रोल (operational control) में काम करती रही हैं।
एसएफएफ की कहानी में सबसे रहस्यमय शब्दों में से एक ‘दापोन’ (Dapon) है, और आज अगर कोई पूछे कि दापोन कौन सा इंडियन आर्मी रैंक है, तो सीधा जवाब यही होगा कि यह भारतीय सेना का नियमित रैंक नहीं है। दापोन मूलतः तिब्बती सैन्य नेतृत्व की टर्मिनोलॉजी और पदनाम थी, और एसएफएफ के शुरुआती दौर में तिब्बती नेतृत्व को अपनी पारंपरिक संरचना और पदनामों के साथ जोड़ा गया था। कुछ ऐतिहासिक विवरणों में वरिष्ठ तिब्बती नेताओं को दापोन कहा गया है, लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण सावधानी जरूरी है। कभी-कभी दापोन को सीधे ब्रिगेडियर या जनरल के बराबर बताया जाता है, जबकि यह एक सरलीकरण मात्र है। एक पूर्व वरिष्ठ एसएफएफ अधिकारी ने दापोन को लगभग कमांडिंग ऑफिसर (Commanding Officer) के समकक्ष बताया था, इसलिए इसका अर्थ समझने के लिए समय और संदर्भ देखना जरूरी है। साफ शब्दों में कहें तो दापोन कोई सामान्य भारतीय सैन्य रैंक नहीं, बल्कि एसएफएफ की ऐतिहासिक तिब्बती कमांड टर्मिनोलॉजी है।
यहीं से एसएफएफ की सबसे अनोखी विशेषता सामने आती है, क्योंकि इसमें तिब्बती कर्मियों के लिए अलग पदनाम इस्तेमाल किए जाते थे, जिनका भारतीय सेना के रैंकों से लगभग समकक्ष दर्जा था। एक न्यायिक रिकॉर्ड में दर्ज तुलना के अनुसार रैपॉन (Rapon) का दर्जा ऑनरेरी कैप्टन के बराबर था, रूपॉन (Rupon) ऑनरेरी लेफ्टिनेंट के समकक्ष था, और पॉलिटिकल लीडर का पद सूबेदार मेजर के बराबर माना जाता था। इसी तरह असिस्टेंट पॉलिटिकल लीडर या कंपनी लीडर को सूबेदार, डिप्टी लीडर को नायब सूबेदार, असिस्टेंट लीडर क्लास वन को हवलदार, असिस्टेंट लीडर क्लास टू को नायक, असिस्टेंट लीडर क्लास थ्री को लांस नायक और ट्रेनी को सिपाही के समकक्ष रखा गया था। यानी एसएफएफ की शुरुआती संरचना में तिब्बती सैनिकों की अपनी अलग टर्मिनोलॉजी थी, लेकिन उसका सैन्य दर्जा भारतीय आर्मी रैंकों के अनुरूप ही रखा गया था।
लेकिन सबसे ऊपर कौन था, यह सवाल तस्वीर को और दिलचस्प बना देता है। एसएफएफ के शीर्ष ऑपरेशनल कमांडर का पद इंस्पेक्टर जनरल, एसएफएफ (Inspector General, SFF) कहलाता है, और यह कोई अलग सिविलियन पदनाम भर नहीं है। इंस्पेक्टर जनरल, एसएफएफ एक इंडियन आर्मी मेजर जनरल रैंक का अधिकारी होता है, और यह व्यवस्था आज तक एसएफएफ की कमांड स्ट्रक्चर की एक महत्वपूर्ण विशेषता रही है। इसके नीचे विकास बटालियन (Vikas Battalions) आती हैं, जिनके कमांडिंग ऑफिसर आमतौर पर कर्नल रैंक के आर्मी अधिकारी होते हैं, और उनके अधीन कंपनियां तथा अन्य अधीनस्थ रैंक काम करते हैं। एसएफएफ की इकाइयों को आम तौर पर विकास बटालियन कहा जाता है, और इसी वजह से सार्वजनिक चर्चाओं में पूरा संगठन कई बार विकास रेजिमेंट (Vikas Regiment) के नाम से भी जाना गया।
यह भ्रम अक्सर होता है कि विकास कोई रैंक है, जबकि हकीकत में विकास कोई रैंक नहीं बल्कि एसएफएफ की ऑपरेशनल बटालियनों की पहचान भर है। इसलिए ‘विकास बटालियन का सीओ’ कहना सही होगा, लेकिन ‘विकास रैंक’ कहना गलत होगा। ठीक इसी तरह दापोन भी आज के संदर्भ में कर्नल, ब्रिगेडियर या मेजर जनरल जैसी सामान्य इंडियन आर्मी रैंक नहीं है, और इस फर्क को समझे बिना एसएफएफ की कमांड संरचना को सही तरीके से नहीं पढ़ा जा सकता।
एसएफएफ की असली कहानी उसके नाम से ज्यादा उसके अभियानों में छिपी है। 1971 में एसएफएफ को पूर्वी पाकिस्तान के चिटगांव हिल ट्रैक्ट्स (Chittagong Hill Tracts) में उतारा गया था, और यह अभियान ऑपरेशन ईगल (Operation Eagle) के नाम से जाना जाता है। एसएफएफ का काम था पाकिस्तानी सेना के ठिकानों, संचार और आपूर्ति मार्गों को निशाना बनाना तथा भारतीय सेना और मुक्ति वाहिनी के अभियान को सहायता देना, और करीब तीन हजार एसएफएफ कर्मियों के इस थिएटर में इस्तेमाल का उल्लेख मिलता है। कई एसएफएफ कर्मियों को वीरता पुरस्कार भी मिले, लेकिन विडंबना यह रही कि इस गुप्त यूनिट की भूमिका लंबे समय तक सार्वजनिक युद्ध-कथा का हिस्सा नहीं बन पाई।
एसएफएफ की सबसे बड़ी प्राकृतिक विशेषज्ञता ऊंचाई पर टिकी थी, और हिमालयी क्षेत्र में कठिन परिस्थितियों में लंबे समय तक काम करने की क्षमता ने इसे भारतीय सुरक्षा व्यवस्था में विशेष महत्व दिया। 1984 में ऑपरेशन मेघदूत (Operation Meghdoot) के दौरान एसएफएफ की इकाइयों को सियाचिन क्षेत्र में इस्तेमाल किया गया, और बाद में 1999 के कारगिल युद्ध में भी एसएफएफ की भूमिका रही। यानी जिस फोर्स को कभी तिब्बत के भीतर कवर्ट ऑपरेशंस के लिए तैयार किया गया था, वह धीरे-धीरे भारत के सबसे कठिन पर्वतीय मोर्चों के लिए भी एक महत्वपूर्ण असेट बन गई।
एसएफएफ का नाम अचानक पूरे देश में तब चर्चा में आया जब पूर्वी लद्दाख में चीन के साथ तनाव के दौरान इसके जवानों की भूमिका सार्वजनिक हुई। अगस्त 2020 के अंत में पैंगोंग त्सो (Pangong Tso) क्षेत्र में हुई कार्रवाई के बाद पहली बार आम भारतीयों के बड़े वर्ग ने इस गुप्त बल के बारे में विस्तार से जानना शुरू किया, और एक एसएफएफ कमांडो की लैंडमाइन विस्फोट में मृत्यु के बाद भी एसएफएफ की भूमिका सार्वजनिक चर्चा में आई। यह वही बल था जिसके बारे में दशकों तक बहुत कम जानकारी सार्वजनिक थी, और लद्दाख की उस घटना ने इसे अचानक अखबारों की सुर्खियों में ला खड़ा किया।
15 जून 2020 वाली गलवान झड़प में, जिसमें कर्नल संतोष बाबू और 16 बिहार रेजिमेंट के जवान शहीद हुए थे, एसएफएफ की सीधी भागीदारी की पुष्टि करने वाला कोई विश्वसनीय सार्वजनिक स्रोत नहीं है। वह मुठभेड़ नियमित भारतीय सेना की यूनिट और चीनी पीएलए (PLA) के बीच हुई थी, और उसमें एसएफएफ के शामिल होने का दस्तावेजी उल्लेख कहीं नहीं मिलता।
एसएफएफ की भूमिका असल में गलवान के करीब ढाई महीने बाद, अगस्त 2020 के अंत में सामने आई। 30 अगस्त 2020 को एसएफएफ के जवानों ने कैलाश रिज को एक पूर्व-निर्धारित अभियान के तहत सुरक्षित कर लिया, जिसने पीएलए को पूरी तरह चौंका दिया, और इस कार्रवाई ने पैंगोंग त्सो के उत्तरी तट पर चीन के फायदे को बेअसर कर दिया और स्पैंगुर गैप-मोल्डो गैरिसन के पूर्व में पीएलए की स्थितियों को पूरी तरह कमजोर बना दिया।
यह अभियान 29 अगस्त 2020 की रात देर से शुरू हुआ था, और इसकी वजह चुशुल बोल में आगे की चौकियों पर तैनात जवानों की खुफिया रिपोर्टों और जमीनी निगरानी से मिली जानकारी थी, जिसमें बताया गया था कि चीनी सैनिक ब्लैक टॉप और हेलमेट टॉप नाम की दो दबदबे वाली चोटियों की ओर बढ़ रहे हैं। चीनी सेना साफ तौर पर पैंगोंग और कैलाश रेंज की ऊंचाइयों पर संभावित भारतीय कब्जे को रोकने की कोशिश कर रही थी। इस पूरे अभियान का केंद्र स्पैंगुर गैप था, जो करीब तीन किलोमीटर चौड़ा और लगभग 4,900 मीटर ऊंचाई पर स्थित एक समतल दर्रा है, और यहीं से किसी भी भविष्य के संघर्ष में चीनी बख्तरबंद हमले का सबसे संभावित रास्ता निकलता।
31 अगस्त 2020 को सुबह रक्षा मंत्रालय की प्रेस विज्ञप्ति में सेना प्रवक्ता कर्नल अमन आनंद के हवाले से कहा गया कि 29-30 अगस्त की रात पीएलए ने पूर्व में बनी सहमति का उल्लंघन करते हुए यथास्थिति बदलने के लिए उकसाने वाली सैन्य हरकतें कीं, और भारतीय सैनिकों ने पैंगोंग त्सो के दक्षिणी तट पर इस पीएलए गतिविधि को पहले ही भांप लिया तथा अपनी स्थिति मजबूत करने और चीनी मंसूबों को नाकाम करने के कदम उठाए। यही आधिकारिक भाषा थी जिसके पीछे असल में एसएफएफ का ऑपरेशन छिपा हुआ था, हालांकि सरकारी बयान में सीधे एसएफएफ का नाम नहीं लिया गया।
इस कार्रवाई का असर सिर्फ जमीन तक सीमित नहीं रहा। चुशुल हाइट्स पर कब्जा बातचीत की मेज पर भारत के लिए एक बड़ी बढ़त बन गया, जिसे स्पेशल फ्रंटियर फोर्स ने बेहतरीन ढंग से तैयार किया था, और रक्षा जानकारों ने चेताया कि इसे किसी सीमित समझौते में जल्दबाजी में गंवाया नहीं जाना चाहिए। यानी असल कहानी यह है कि गलवान की झड़प ने सीमा पर तनाव को चरम पर पहुंचाया, लेकिन जिस अभियान ने वास्तव में सैन्य संतुलन पलटा, वह एसएफएफ का कैलाश रेंज ऑपरेशन था, जो गलवान के महीनों बाद अंजाम दिया गया।
एसएफएफ आखिर इतनी गुप्त क्यों रही, इसका उत्तर इसकी प्रकृति में ही छिपा है, क्योंकि यह कोई सामान्य इन्फैंट्री रेजिमेंट नहीं बल्कि एक विशेष कवर्ट फोर्स के रूप में बनाई गई थी। इसकी जिम्मेदारियों में समय के साथ बदलाव आया, लेकिन गोपनीयता इसकी पहचान बनी रही, इसके अभियानों की पूरी जानकारी सार्वजनिक नहीं होती, इसकी ऑपरेशनल तैनाती को लेकर आधिकारिक जानकारी सीमित रहती है, इसकी कमांड स्ट्रक्चर सामान्य आर्मी फॉर्मेशन जैसी दिखाई नहीं देती, और इसके कई पुराने पदनाम आम भारतीय सैन्य टर्मिनोलॉजी से अलग हैं।
सबसे अहम सवाल यही है कि क्या एसएफएफ भारतीय सेना है, और इसका जवाब तकनीकी रूप से नहीं में है। एसएफएफ भारतीय सेना का नियमित हिस्सा नहीं है, बल्कि यह कैबिनेट सचिवालय के अधीन एक विशेष संगठन के रूप में विकसित हुई, और इसकी इकाइयां आवश्यकता के अनुसार भारतीय सेना के ऑपरेशनल कंट्रोल में काम कर सकती हैं। लेकिन इसके शीर्ष पर आर्मी के मेजर जनरल रैंक के इंस्पेक्टर जनरल और कई आर्मी अधिकारियों की भूमिका इसकी संरचना को भारतीय सैन्य व्यवस्था से बेहद करीब से जोड़ती है, और इसीलिए इसे न तो पूरी तरह सामान्य आर्मी यूनिट कहना सही है और न ही सेना से पूरी तरह अलग समझना।
एसएफएफ की सबसे बड़ी खासियत शायद इसके हथियारों में नहीं, बल्कि इसकी मानव संरचना में छिपी है। एक तरफ तिब्बती लड़ाकों की पर्वतीय युद्ध क्षमता और स्थानीय भूगोल की गहरी समझ है, दूसरी तरफ भारतीय सेना के अधिकारियों की सैन्य कमान और ऑपरेशनल विशेषज्ञता है, और इन दोनों के ऊपर एक ऐसी कमांड व्यवस्था है जो सामान्य आर्मी हायरार्की से अलग विकसित हुई। यही संयोजन एसएफएफ को भारत की सबसे विशिष्ट सैन्य संरचनाओं में से एक बनाता है, और यही वजह है कि स्पेशल फ्रंटियर फोर्स से एस्टैब्लिशमेंट 22, फिर विकास रेजिमेंट और अंततः विकास बटालियन तक का यह सफर आर्मी अधिकारियों, विशेष रूप से प्रशिक्षित कर्मियों और अलग ऐतिहासिक टर्मिनोलॉजी को एक साथ जोड़ता है।
यही कारण है कि एसएफएफ सिर्फ एक सैन्य इकाई नहीं, बल्कि भारत की सुरक्षा व्यवस्था के सबसे गुप्त अध्यायों में से एक है, और शायद इसकी सबसे दिलचस्प बात यही है कि जिस फोर्स को कभी सार्वजनिक पहचान से दूर रखकर बनाया गया था, आज उसी की सबसे बड़ी ताकत उसकी गुमनामी, पर्वतीय युद्धक क्षमता और विशेष ऑपरेशनल भूमिका है।
