ढाका में बमबारी, इराकी एयरफोर्स को ट्रेनिंग, पढ़िये ग्रुप कैप्टन दिलीप नीलकंठ पंडित की कहानी

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भारतीय वायुसेना के इतिहास में कुछ नाम ऐसे हैं, जिनका उल्लेख केवल सैन्य रिकॉर्ड तक सीमित नहीं रहता, बल्कि वे साहस, कर्तव्यनिष्ठा और राष्ट्रसेवा की जीवंत मिसाल बन जाते हैं। ग्रुप कैप्टन दिलीप नीलकंठ पंडित ऐसा ही एक नाम हैं। 1971 के बांग्लादेश मुक्ति संग्राम से लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इराकी वायुसेना को प्रशिक्षण देने तक, उनका जीवन भारतीय वायुसेना की गौरवगाथा का महत्वपूर्ण अध्याय है।
शुरुआती जीवन

वर्ष 1942 में जन्मे दिलीप नीलकंठ पंडित का शुरुआती जीवन मुंबई में बीता। सेंट जेवियर्स कॉलेज में पढ़ाई के दौरान ही उन्होंने एनडीए के लिए यूपीएससी परीक्षा उत्तीर्ण कर ली और वर्ष 1960 में राष्ट्रीय रक्षा अकादमी में प्रवेश पाया। यह वही मोड़ था, जहां से उनका जीवन आकाश की ऊंचाइयों से जुड़ गया। वर्ष 1963 में जोधपुर स्थित भारतीय वायुसेना फ्लाइंग कॉलेज से प्रशिक्षण लेकर वे पायलट ऑफिसर के रूप में कमीशन हुए और पहली तैनाती पुणे की 220 स्क्वाड्रन में मिली, यहीं से उनकी उड़ान का वास्तविक सफर शुरू हुआ।

सुखोई-7 की ट्रेनिंग से मिली पहचान

शुरु में उन्होंने डी हैविलैंड वैम्पायर जैसे विमानों पर उड़ान भरी लेकिन कुछ समय बाद वे सुपरसोनिक विमानों की दुनिया में पहुंचे और अंबाला की 32 स्क्वाड्रन में सुखोई-7 उड़ाने का प्रशिक्षण लिया। जनवरी 1971 में, फ्लाइट लेफ्टिनेंट के रूप में, उन्होंने तांबरम में फ्लाइंग इंस्ट्रक्टर कोर्स पूरा किया और बीदर में प्रशिक्षक के रूप में तैनात हुए। वहां वे युवा कैडेट्स को उड़ान का पहला पाठ पढ़ा रहे थे, लेकिन नियति ने उनके लिए युद्ध का आह्वान लिख रखा था।

भारत की तैयारी

अप्रैल 1971 में जब भारत ने पूर्वी पाकिस्तान (वर्तमान बांग्लादेश) में संभावित सैन्य कार्रवाई की तैयारी शुरू की, तब स्क्वाड्रन ड्यूटी से बाहर सभी फाइटर पायलटों को दोबारा ऑपरेशनल भूमिका में बुलाया गया। फ्लाइट लेफ्टिनेंट पंडित बीदर से वापस अंबाला पहुंचे और बाद में उन्हें 221 स्क्वाड्रन से जोड़ा गया। यह स्क्वाड्रन भारतीय वायुसेना की पहली सुखोई-7 स्क्वाड्रन थी, जिसे पूर्वी मोर्चे पर निर्णायक भूमिका निभाई थी।

पाकिस्तानी F-86 सेबर का खात्मा

दिसंबर 1971 में युद्ध छिड़ते ही 221 स्क्वाड्रन को ढाका के तेजगांव और कुर्मिटोला एयरफील्ड पर हमले का आदेश मिला। 4 दिसंबर की सुबह पानागढ़ एयरबेस (अब-अर्जन सिंह एयरबेस) से उड़ान भरते सुखोई-7 विमानों ने इतिहास रच दिया। पाकिस्तानी एंटी-एयरक्राफ्ट गनों की भीषण गोलाबारी के बीच भारतीय पायलटों ने दुश्मन के एयरफील्ड को गंभीर क्षति पहुंचाई। जमीन पर खड़े पाकिस्तानी F-86 सेबर विमान को नष्ट किए गए, रनवे क्षतिग्रस्त हुए और ढाका की हवाई क्षमता को बड़ा झटका लगा।

जहाज के तेल खत्म, जोखिम भरी हुई थी लैंडिंग

इसी दिन शाम को फ्लाइट लेफ्टिनेंट दिलीप पंडित को एक जोखिम भरे फोटो-रिकॉनिसेंस मिशन पर भेजा गया। बिना बम और रॉकेट के, केवल गनों के सहारे, उन्होंने दुश्मन एयरफील्ड की तस्वीरें लीं। तभी पाकिस्तानी F-86 सेबर विमानों ने उनका पीछा किया। आसमान में जानलेवा मोड़ और तीव्र गति के बीच उन्होंने आफ्टरबर्नर चालू किया और सीमा की ओर निकल पड़े। ईंधन समाप्त होने पर वे कोलकाता के दमदम एयरबेस पर उतरे, जहां उनका विमान रनवे पर ही रुक गया। यह मिशन न केवल साहस का उदाहरण था, बल्कि युद्ध की जटिलताओं से मिली एक महत्वपूर्ण सीख भी था।

26 जनवरी की परेड में हुए शामिल

11 दिसंबर को स्क्वाड्रन को पश्चिमी मोर्चे पर भेजा गया। युद्ध के बाद, 26 जनवरी 1972 की गणतंत्र दिवस परेड में भाग लेना उनके लिए गर्व का क्षण था। इसके बाद उनका करियर नई ऊंचाइयों की ओर बढ़ता गया। वे स्क्वाड्रन लीडर बने, फ्लाइट कमांडर रहे, वेलिंगटन स्टाफ कॉलेज से स्टाफ कोर्स किया और फाइटर कमांड लीडर्स कोर्स भी पूरा किया।

ईराकी एयरफोर्स को दी ट्रेनिंग

वर्ष 1981 में विंग कमांडर के रूप में उन्हें एक अंतरराष्ट्रीय जिम्मेदारी सौंपी गई। ईरान-इराक युद्ध के दौरान वे इराक गए और वहां की वायुसेना के पायलटों को प्रशिक्षण दिया। लगभग ढाई वर्षों तक उन्होंने विदेशी धरती पर भारतीय वायुसेना की पेशेवर दक्षता का परिचय दिया। स्वदेश लौटने पर वे एयर हेडक्वार्टर्स में डिप्टी डायरेक्टर ऑफ फ्लाइट सेफ्टी बने, फिर हाशिमारा में चीफ एयरफोर्स ऑपरेशंस ऑफिसर और भुज एयरबेस पर 27 विंग के कमांडर रहे। 1993 में उन्होंने एयर इंटेलिजेंस डायरेक्टरेट में कार्य किया और अंततः वर्ष 2001 में सेवानिवृत्त हुए।

चार दशक की राष्ट्र सेवा पीढ़ियों के लिए प्रेरणा

करीब चार दशकों की सेवा में ग्रुप कैप्टन दिलीप नीलकंठ पंडित ने 5000 से अधिक उड़ान घंटे पूरे किए और 8 प्रकार के विमानों पर उड़ान भरी। ढाका के आसमान से लेकर मध्य-पूर्व की तपती धरती तक, उनका जीवन साहस, अनुशासन और राष्ट्रभक्ति की प्रेरक कहानी है, जो आने वाली पीढ़ियों के लिए सदैव मार्गदर्शक बनी रहेगी।

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